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10 हाथों वाले भगवान गोवर्धननाथजी की दुर्लभ प्रतिमा, जिसे इंदौर नहीं ला सकीं देवी अहिल्याबाई

इस प्रतिमा से जुड़ी स्थानीय मान्यता बेहद रोचक है। कहा जाता है कि देवी अहिल्याबाई होलकर वर्ष 1778 में इसे इंदौर लाना चाहती थीं। इसके लिए प्रतिमा को बग्घी में रखा गया, लेकिन बग्घी आगे नहीं बढ़ सकी। इसके बाद अहिल्याबाई ने प्रतिमा को कम्पेल में ही स्थापित करवा दिया।

By Pranay ChouhanEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Sat, 07 Nov 2026 01:29:08 PM (IST)Updated Date: Sat, 07 Nov 2026 01:38:20 PM (IST)
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10 हाथों वाले भगवान गोवर्धननाथजी की दुर्लभ प्रतिमा, जिसे इंदौर नहीं ला सकीं देवी अहिल्याबाई
400 साल पुरानी भगवान द्वारकाधीश की प्रतिमा। इसमें शेषनाग, गरुड़, गोपियां और गाय-बछड़ों की आकृतियां भी हैं अंकित।

HighLights

  1. कम्पेल में करीब 328 साल से विराजित हैं भगवान।
  2. काले पाषाण की प्रतिमा में शंख, चक्र, गदा, पद्म।
  3. भगवान इसमें गोवर्धन पर्वत धारण किए हुए हैं।

प्रणय चौहान, इंदौर। दीपावली के अगले दिन देशभर में गोवर्धन पूजा की जाती है। भगवान श्रीकृष्ण के गोवर्धन पर्वत धारण करने की स्मृति में होने वाले इस पर्व पर अन्नकूट का भोग लगाया जाता है और गोवर्धननाथजी की आराधना होती है। इंदौर के पास कम्पेल गांव में भगवान का एक ऐसा दुर्लभ स्वरूप विराजित है, जो अपनी अनूठी बनावट के कारण विशेष पहचान रखता है।

यहां भगवान गोवर्धननाथजी की दस हाथों वाली काले पाषाण की प्रतिमा है। करीब 328 साल पुरानी बताई जाने वाली इस प्रतिमा की विशेषता केवल इसका बहुभुजी स्वरूप नहीं, बल्कि इसमें उकेरी गईं धार्मिक आकृतियां और देवी अहिल्याबाई होलकर से जुड़ी रोचक मान्यता भी है। वहीं, मंदिर के पूर्वज राजस्थान के उदयपुर से 400 साल पहले भगवान द्वारकाधीश से लेकर आए थे।


एक प्रतिमा में कई दिव्य स्वरूप

  • मंदिर के मुख्य पुजारी गणेश बैरागी के अनुसार प्रतिमा के 10 हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म जैसे आयुध हैं। दो हाथों से भगवान बांसुरी धारण किए हुए हैं, जबकि एक हाथ में गोवर्धन पर्वत है।
  • प्रतिमा के ऊपर शेषनाग का अंकन है और पास में गरुड़ की आकृति भी दिखाई देती है।
  • इसके आसपास तीन-तीन गोपियां और बछड़ों को दूध पिलाती गायों की आकृतियां उकेरी गई हैं।
  • इस तरह एक ही प्रतिमा में भगवान के कई धार्मिक स्वरूपों और कृष्णलीला के प्रसंगों को दर्शाया गया है।
  • गोवर्धन पूजा के अवसर पर इस प्रतिमा का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि इसका एक हाथ स्वयं गोवर्धन पर्वत धारण किए हुए है।

इंदौर लाना चाहती थीं अहिल्याबाई

दूसरे मुख्य पुजारी पवन बैरागी के अनुसार इस प्रतिमा से जुड़ी स्थानीय मान्यता बेहद रोचक है। कहा जाता है कि देवी अहिल्याबाई होलकर वर्ष 1778 में इसे इंदौर लाना चाहती थीं। इसके लिए प्रतिमा को बग्घी में रखा गया, लेकिन बग्घी आगे नहीं बढ़ सकी। इसके बाद अहिल्याबाई ने प्रतिमा को कम्पेल में ही स्थापित करवा दिया। कम्पेल कभी होलकर रियासत का महत्वपूर्ण परगना और प्रशासनिक केंद्र था। यहां देवी अहिल्याबाई की कचहरी और गादी भी थी।

तालाब में मिली थी प्रतिमा

तीसरे मुख्य पुजारी जुगल बैरागी के अनुसार स्थानीय परंपरा के अनुसार उदयपुर से द्वारिकाधीश की प्रतिमा लेकर आए साधु कम्पेल में कुटिया बनाकर रहते थे।

पूजा-अर्चना और साधना के दौरान उन्हें तालाब में इस दुर्लभ प्रतिमा के दर्शन हुए। गांव के सक्षम पटेल और सालामसिंह ने वर्ष 1698 में इसे स्थापित करवाया था।

इस तरह प्रतिमा से जुड़ी कहानी में साधुओं की आस्था, ग्रामीणों का योगदान और होलकरकालीन विरासत के कई प्रसंग जुड़े हैं।

गोवर्धन पूजा के दिन यह प्रतिमा भगवान श्रीकृष्ण के उस स्वरूप की याद दिलाती है, जिसमें उन्होंने गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों को वर्षा और इंद्र के प्रकोप से बचाया था।

कम्पेल का मंदिर मालवा की धार्मिक विरासत का ऐसा उदाहरण है, जहां एक दुर्लभ प्रतिमा में कृष्णलीला, शिल्पकला और इतिहास के कई रंग एक साथ दिखाई देते हैं।

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