
धर्म डेस्क। थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक में एक ऐसी रामकथा मौजूद है, जिसके पात्र भारतीय रामायण से मिलते हैं, लेकिन उसका नाम और प्रस्तुति अलग है। यहां भगवान राम की कहानी को ‘रामाकियन’ कहा जाता है। यह थाई साहित्य, पारंपरिक नृत्य, नाटकों और मंदिरों की चित्रकला का अहम हिस्सा है। सवाल है कि जिस रामकथा को भारत में महर्षि वाल्मीकि से जोड़ा जाता है, वह दक्षिण-पूर्व एशिया के इस देश तक कैसे पहुंची? और क्या थाईलैंड में सुनाई जाने वाली रामायण वही है, जिसे भारत में पढ़ा और सुना जाता है?
भारतीय परंपरा में महर्षि वाल्मीकि को रामायण का आदिकवि माना जाता है। संस्कृत में रचित वाल्मीकि रामायण में भगवान राम के जन्म, वनवास, सीता हरण, रावण के साथ युद्ध और अयोध्या वापसी की कथा मिलती है। लेकिन समय के साथ रामकथा भारत की अलग-अलग भाषाओं और फिर दक्षिण-पूर्व एशिया की संस्कृतियों तक पहुंची।
थाईलैंड में रामकथा का लोकप्रिय रूप ‘रामाकियन’ कहलाता है। इसका नाम संस्कृत के ‘रामायण’ से जुड़ा है। यह कहानी भारत से थाईलैंड तक किसी एक लेखक या एक घटना के जरिए नहीं पहुंची। सदियों तक व्यापार, धार्मिक संपर्कों, साहित्य और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से भारतीय महाकाव्यों की कथाएं दक्षिण-पूर्व एशिया में पहुंचीं और स्थानीय परंपराओं का हिस्सा बन गईं।
रामाकियन में राम, सीता, रावण और हनुमान जैसे परिचित पात्र मिलते हैं। हालांकि, कहानी की प्रस्तुति और कुछ प्रसंग भारतीय रामायण के अलग-अलग संस्करणों से भिन्न हैं। थाई परंपरा में रावण को ‘तोसाकन’ और राम को ‘फ्रा राम’ कहा जाता है। हनुमान का चरित्र भी थाई नृत्य-नाट्य परंपरा में खास अंदाज में प्रस्तुत किया जाता है।
थाईलैंड में रामाकियन सिर्फ पढ़ने की कहानी नहीं है। इसे पारंपरिक ‘खोन’ मुखौटा नृत्य-नाटक के जरिए मंच पर दिखाया जाता है। बैंकॉक के एमराल्ड बुद्ध मंदिर परिसर में भी रामाकियन के प्रसंगों को दर्शाने वाली भित्तिचित्रों की लंबी श्रृंखला प्रसिद्ध है। इससे पता चलता है कि रामकथा वहां साहित्य से आगे बढ़कर कला और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन चुकी है।
थाईलैंड की रामाकियन को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि भारत में भी रामायण का केवल एक ही साहित्यिक रूप नहीं है। संस्कृत की वाल्मीकि रामायण के अलावा तमिल में कंबन की ‘इरामावतारम’, अवधी में तुलसीदास की ‘रामचरितमानस’ और बंगाली में कृतिवासी रामायण जैसे प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। इन रचनाओं में रामकथा को अलग-अलग भाषाओं, काव्य शैलियों और धार्मिक-सांस्कृतिक दृष्टिकोणों से प्रस्तुत किया गया।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि हर जगह रामायण बिल्कुल एक जैसी है। कुछ प्रसंगों, पात्रों और उनके व्यवहार के चित्रण में अंतर मिलता है। ये अंतर बताते हैं कि रामकथा को अलग-अलग समाजों ने अपनी सांस्कृतिक दुनिया में किस तरह अपनाया।
एक और सवाल उठता है कि अगर वाल्मीकि ने सबसे पहले रामायण लिखी थी, तो उनकी मूल पांडुलिपि कहां है? परंपरा वाल्मीकि को रामायण का रचयिता मानती है, लेकिन उनके हाथों लिखी गई मूल प्रति आज उपलब्ध नहीं है। रामायण लंबे समय तक मौखिक परंपरा से आगे बढ़ी और फिर अलग-अलग कालखंडों में इसकी पांडुलिपियां तैयार हुईं। इसलिए किसी एक मौजूदा पांडुलिपि को निश्चित रूप से रामायण की पहली लिखित प्रति कहना उचित नहीं होगा।
थाईलैंड की रामाकियन से लेकर भारत की अलग-अलग रामायणों तक, इस कथा की यात्रा दिखाती है कि कहानियां सीमाओं में बंधकर नहीं रहतीं। भाषा बदलती है, कला का रूप बदलता है और पात्रों की प्रस्तुति भी बदल सकती है, लेकिन रामकथा अलग-अलग समाजों में सदियों तक सुनाई जाती रही है। दिवाली पर भगवान राम की अयोध्या वापसी को याद करने के बीच यह जानना भी दिलचस्प है कि उनकी कथा भारत से बाहर भी एक अलग सांस्कृतिक जीवन जी रही है।