33 वर्षों से निभ रही जवारा जुलूस की परंपरा, मां काली के स्वरूप बने आकर्षण
दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर में जवारा आयोजन की परंपरा पिछले 33 वर्षों से निरंतर निभाई जा रही है। नवरात्रि में जवारे धारण करना और उनकी पूजा करना देवी आराधन...और पढ़ें
Publish Date: Fri, 23 Oct 2026 01:21:10 PM (IST)Updated Date: Fri, 23 Oct 2026 01:25:35 PM (IST)
रांझी का ज्वारा जुलूस रहा श्रदधा का केंद्र।HighLights
- सिर पर जवारे के कलश धारण कर निकलीं महिलाएं।
- रोशनी से सजी छतरियों के बीच उमड़ा श्रद्धा का सैलाब।
- पारंपरिक परिधानों में शामिल हुई महिलाओं की टोली।
जबलपुर। रांझी के दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर से नवरात्रि पर निकलने वाला जवारा जुलूस 33 वर्षों से आस्था और परंपरा की ज्योति प्रज्वलित कर रहा है। इस वर्ष भी धार्मिक उल्लास के बीच निकले जुलूस में मां काली के स्वरूप में सजे श्रद्धालु आकर्षण का केंद्र रहे।
सिर पर जवारे के कलश धारण किए महिलाओं की टोलियां और विद्युत रोशनी से जगमगाती सजीली छतरियों ने आयोजन को विशिष्ट छटा प्रदान की।
जुलूस में महिलाएं सिर पर जवारे से सजे कलश धारण कर चल रही थीं। हरी-हरी जवारे की पौध, लाल चुनरियों और पारंपरिक धार्मिक प्रतीकों से सजे कलश नवरात्रि की आस्था का प्रतीक बने। पारंपरिक परिधानों में शामिल महिलाओं की टोली ने आयोजन की धार्मिक गरिमा बढ़ाई।
वहीं, मां काली के स्वरूप में विशेष वेशभूषा, मुखौटों और फूलों की मालाओं से सजे श्रद्धालुओं ने लोगों का ध्यान खींचा। जुलूस के मार्ग पर रोशनी से सजी छतरियां और श्रद्धालुओं की भागीदारी उत्सव के उल्लास को अभिव्यक्त करती रहीं।
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तीन दशक से अधिक पुरानी परंपरा
- दक्षिणमुखी हनुमान मंदिर में जवारा आयोजन की परंपरा पिछले 33 वर्षों से निरंतर निभाई जा रही है।
- नवरात्रि में जवारे धारण करना और उनकी पूजा करना देवी आराधना, श्रद्धा और मंगलकामना से जुड़ा है।
- इसी धार्मिक विश्वास के साथ क्षेत्र के श्रद्धालु हर वर्ष इस आयोजन में सहभागी बनते हैं।
- यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक विरासत को भी सहेज रही है।
- आयोजन में अध्यक्ष शैलेश यादव, शिवनारायण चतुर्वेदी महाराज, साहिल महाराज सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु और स्थानीय नागरिक शामिल हुए।
- जवारे के कलश धारण किए महिलाओं की टोली और मां काली के स्वरूप में सजे श्रद्धालुओं की उपस्थिति जुलूस के प्रमुख आकर्षण रहे।
- रांझी की यह परंपरा नई पीढ़ी को भी धार्मिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ रही है।