‘शुभ काम को कभी कल पर न टालें...’ मरते-मरते रावण ने लक्ष्मण को दी थी जीवन की ये 3 सबसे बड़ी सीख
दशहरे पर असत्य पर सत्य की विजय का उत्सव मनाया जाता है। रामायण कथा के अनुसार, लंकापति रावण महाज्ञानी और नीतिशास्त्र का प्रकांड विद्वान था, इसलिए उसके व...और पढ़ें
Publish Date: Tue, 20 Oct 2026 05:38:21 PM (IST)Updated Date: Tue, 20 Oct 2026 05:38:21 PM (IST)

धर्म डेस्क। आज देशभर में असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का पावन महापर्व विजयादशमी (दशहरा) मनाया जा रहा है। रामायण की पावन कथा के अनुसार, इसी तिथि पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने लंकापति रावण का संहार किया था।
यद्यपि रावण का अंत उसके अहंकार और अनैतिक आचरण के कारण हुआ, परंतु वह केवल एक पराक्रमी योद्धा ही नहीं, बल्कि चारों वेदों का प्रकांड विद्वान, महाज्ञानी पंडित, महाकाल का अनन्य भक्त और नीतिशास्त्र का महान ज्ञाता भी था। यही कारण था कि रावण के धराशायी होने के बाद भगवान श्री राम ने स्वयं अपने अनुज लक्ष्मण को रावण के समीप जाकर उससे राजनीति और जीवन-नीति का ज्ञान प्राप्त करने भेजा था।
मरणासन्न अवस्था में रावण ने लक्ष्मण को 3 अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यावहारिक जीवन की सीख दी थीं, जो आज भी हर मनुष्य के लिए मार्गदर्शक हैं-
1. शुभ कार्य में कभी विलंब न करें (कल पर काम न टालें)
- रावण की सीख: जीवन में जब भी कोई शुभ, कल्याणकारी या अच्छा कार्य करने का विचार आए, तो उसे बिना किसी अनावश्यक देरी के तुरंत पूरा कर लेना चाहिए। इसके विपरीत, यदि मन में कोई अशुभ, पापपूर्ण या गलत विचार आए, तो उसे जितना संभव हो सके टालते रहना चाहिए।
- रावण का पश्चाताप: रावण ने लक्ष्मण से कहा कि वह स्वर्ग तक सीढ़ियां बनाना चाहता था और समुद्र के जल को मीठा करना चाहता था, लेकिन उसने इन शुभ संकल्पों को कल पर टालता रहा। वहीं, श्री राम से शत्रुता का गलत विचार आते ही उसने उसमें तनिक भी देरी नहीं की, जो उसके विनाश का कारण बना।
2. शत्रु और रोग को कभी छोटा (कमजोर) न समझें
- रावण की सीख: मनुष्य को कभी भी अपने किसी शत्रु (विरोधी) और रोग (बीमारी) को तुच्छ या कमजोर समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। एक छोटी-सी उपेक्षित बीमारी आगे चलकर प्राणघातक बन सकती है, और एक साधारण दिखने वाला शत्रु भी बड़ा संहार कर सकता है।
- रावण का पश्चाताप: रावण ने वानर-भालुओं की सेना और श्री राम-लक्ष्मण को तुच्छ मनुष्य मानकर आंका था। उसने अपनी अमरता के वरदान में ब्रह्मा जी से मनुष्य और वानरों के अतिरिक्त सभी से सुरक्षा मांगी थी, क्योंकि वह उन्हें नगण्य समझता था। रावण की यही अति-आत्मविश्वास वाली भूल उसके सर्वनाश का कारण बनी।
3. अपने गुप्त रहस्य (कमजोरी) कभी किसी को न बताएं
- रावण की सीख: व्यक्ति को अपने जीवन के अत्यंत गोपनीय रहस्यों, कमजोरियों और जीवन मरण से जुड़ी बातों को हमेशा गुप्त रखना चाहिए। यहां तक कि अपने सबसे प्रिय और करीबी व्यक्ति के सामने भी अपने अंतिम रहस्य का खुलासा बहुत सोच-समझकर ही करना चाहिए।
- रावण का पश्चाताप: रावण की नाभि में अमृत कुंड स्थित था, जिससे उसकी मृत्यु साधारण बाणों से संभव नहीं थी। यह परम रहस्य केवल उसके भाई विभीषण को ज्ञात था। जब युद्धभूमि में विभीषण ने श्री राम को रावण की नाभि में तीर मारने का रहस्य बताया, तभी श्री राम रावण का संहार कर सके। रावण ने माना कि अपने इस रहस्य को उजागर करना ही उसकी मृत्यु का मुख्य कारण बना।