
विवेक पाराशर, नईदुनिया, खरगोन : सदियों पुरानी आस्था और विज्ञान का अनूठा संगम शहर के मध्य स्थित प्राचीन बाकी माता मंदिर में देखने को मिलता है। नवरात्रि महापर्व के दौरान यहां एक ऐसी परंपरा निभाई जा रही है जो अध्यात्म के साथ-साथ सेहत का भी अनूठा संदेश देती है।
करीब 295 वर्ष प्राचीन इस मंदिर में सदियों से नवरात्रि के दौरान माता को विशेष रूप से पान के बीड़े और जुवार की धानी का भोग लगाया जाता है। समय के साथ इस परंपरा का दायरा भी बढ़ता गया है और कभी एक पान के बीड़े से शुरू हुआ यह सिलसिला अब बढ़कर 501 बीड़ों तक पहुंच गया है।
यह परंपरा सिर्फ आस्था तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे आयुर्वेद और विज्ञान का एक मजबूत आधार भी जुड़ा हुआ है। मंदिर में प्रतिदिन दोपहर की महाआरती के बाद माता को पान के बीड़े और जुवार की धानी का भोग अर्पित किया जाता है।
आरती के पश्चात यह पान का विशेष भोग उन श्रद्धालुओं को वितरित किया जाता है जो नवरात्रि के उपवास रखते हैं, जबकि उपवास न करने वाले श्रद्धालुओं को जुवार की धानी और अन्य प्रसाद दिया जाता है। मंदिर से जुड़े कैलाश खोड़े बताते हैं कि दिन के इस विशेष भोग के अलावा रात को होने वाली आरती के बाद माता को अलग-अलग प्रकार की मिठाइयों का भोग भी लगाया जाता है और बांटा जाता है।
व्रत रखने वालों के लिए यह पान का बीड़ा किसी वरदान से कम नहीं होता है। मंदिर से जुड़ीं कुमुद परसाई, संगीता जोशी, वंदना खोड़े, रचना कायरे, विनीता वोरे, अंजली खोड़े व निशा वोरे के अनुसार इस विशेष भोग को उपवास रखने वाले श्रद्धालुओं के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ही तैयार किया जाता है। इस पान के बीड़े में दालचीनी, जायफल, लौंग, इलायची, जायपत्री, मिश्री, पीपरमेंट और जेष्ठिमधु जैसी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया जाता है। उक्त श्रद्धालु घर से बीड़े का प्रसाद तैयार करके लाती हैं।
इस परंपरा के वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक पहलुओं पर बात करते हुए शहर के आयुर्वेदाचार्य डॉ. केआर शर्मा बताते हैं कि आमतौर पर भोजन के बाद पान खाने की परंपरा के पीछे भी पाचन क्रिया को बेहतर बनाने का वैज्ञानिक कारण होता है। पान के साथ लार पेट में जाने से पाचन सुधरता है और चूना हड्डियों को मजबूती देता है।
जहां तक बाकी माता मंदिर के इस विशेष भोग की बात है तो इसमें उपयोग की जाने वाली सामग्री असल में बहुमूल्य जड़ी-बूटियां हैं। यह जड़ी-बूटियां उपवास के दौरान बढ़ने वाली पेट की गर्मी यानी जठराग्नि को शांत करती हैं और साथ ही शक्तिवर्धक होने के कारण व्रत में होने वाली कमजोरी को भी तुरंत दूर करती हैं। इस प्रकार बाकी माता के दरबार में मिलने वाला यह प्रसाद आस्था के साथ भक्तों की सेहत का भी पूरा ख्याल रखता है।
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