गलत दिन तर्पण करने पर भटक सकती है आत्मा! सुहागिनों के श्राद्ध में भूलकर भी न करें यह गलती
पितृ पक्ष में दिवंगत सौभाग्यवती (सुहागिन) स्त्रियों का श्राद्ध केवल आश्विन कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि (मातृ नवमी) को ही करने का शास्त्रसम्मत विधान है। हर...और पढ़ें
Publish Date: Sun, 04 Oct 2026 02:40:43 PM (IST)Updated Date: Sun, 04 Oct 2026 02:49:44 PM (IST)
सुहागिन स्त्रियों के श्राद्ध और मातृ नवमी के सही नियम। (एआई जनरेटेड)HighLights
- सुहागिनों का श्राद्ध नवमी के नियम
- मातृ नवमी का खास विधान होता है
- सुहाग सामग्री दान का महत्व अधिक है
धर्म डेस्क। सनातन धर्म में भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाला पितृ पक्ष (महालय श्राद्ध) पूर्वजों की आत्मा की शांति, तृप्ति और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का सबसे पवित्र समय माना जाता है। इन 16 दिनों में तर्पण, पिंडदान, पंचबलि भोग और दान-पुण्य से पितरों की कृपा प्राप्त होती है।
शास्त्रों में विभिन्न स्थितियों में देह त्यागने वाले परिजनों के लिए श्राद्ध के अलग-अलग नियम निर्धारित हैं। विशेष रूप से सुहागिन (सौभाग्यवती) स्त्रियों के श्राद्ध को लेकर ज्योतिषाचार्य ने शास्त्रसम्मत नियम और सावधानियां बताई हैं, जिनका पालन न करने पर परिजनों को पितृ दोष और गृह-कलह का सामना करना पड़ सकता है।
सुहागिनों का श्राद्ध केवल नवमी तिथि (मातृ नवमी) को ही क्यों?
पंडित मनोज मिश्रा के अनुसार, जो स्त्रियां अपने पति के जीवित रहते हुए संसार से विदा लेती हैं, उन्हें सौभाग्यवती या सुहागिन कहा जाता है।
- शास्त्रों का विधान: ऐसी मातृ शक्तियों (माता, दादी, सास या पत्नी) का श्राद्ध आश्विन कृष्ण पक्ष की 'नवमी तिथि' (जिसे मातृ नवमी या अविधवा नवमी भी कहते हैं) को ही किया जाना चाहिए।
- सामान्य तिथि पर श्राद्ध का फल नहीं: यदि कोई व्यक्ति अपनी दिवंगत सौभाग्यवती माता या पत्नी का श्राद्ध नवमी के बजाय उनकी मृत्यु की सामान्य तिथि पर करता है, तो उस धार्मिक अनुष्ठान का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
सही तिथि पर श्राद्ध न करने के दुष्परिणाम
ज्योतिषाचार्य के अनुसार, यदि सुहागिन स्त्री का श्राद्ध सही तिथि और विधि से न किया जाए:
- पितरों की अतृप्ति व प्रेत योनि: शास्त्रानुसार, तर्पण और श्राद्ध सही विधि से न होने पर पितृ अतृप्त रह जाते हैं और उनकी आत्मा भटकती है।
- पारिवारिक बाधाएं व गृह-कलह: इसके परिणामस्वरूप परिजनों को मांगलिक कार्यों में अड़चनें, अकारण घर में लड़ाई-झगड़े, आर्थिक तंगी और वंश वृद्धि में रुकावट जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
'मातृ ऋण' से मुक्ति के अचूक उपाय
'गरुड़ पुराण' सहित अन्य धार्मिक ग्रंथों के प्रमाण अनुसार, मातृ नवमी के दिन निम्नलिखित विधि-विधान से श्राद्ध करने पर 'मातृ ऋण' से मुक्ति मिलती है और कुल में सुख-समृद्धि का वास होता है:
- गंगा घाट या तीर्थ स्थल पर पिंडदान: पवित्र नदियों के तट (जैसे हरिद्वार, काशी या गया जी) पर या घर में ही तिल, कुशा और जल से तर्पण व पिंडदान करें।
- सुहागिन स्त्री/ब्राह्मणी को भोजन: इस दिन किसी सौभाग्यवती स्त्री या ब्राह्मणी को आदरपूर्वक घर बुलाकर सात्विक भोजन कराएं।
- सुहाग सामग्री का दान: भोजन के पश्चात सुहागिन स्त्री को सुहाग की सामग्री (जैसे सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां, लाल वस्त्र, आलता आदि) और अपनी सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा देकर आशीर्वाद लें।
(नोट: यह रिपोर्ट हरिद्वार के ज्योतिषाचार्य पंडित मनोज मिश्रा के वक्तव्य, गरुड़ पुराण और सनातन धर्मशास्त्रों के नियमों पर आधारित है।)
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