बस्तर दशहरा विशेष: बंगाल से बस्तर तक, विस्थापन के दर्द से सहेजी दुर्गापूजा की परंपरा
जगदलपुर में 10 हजार से अधिक बंगाली समाज के लोग रहते हैं। इनमें बड़ी संख्या उन परिवारों के वंशजों की है, जो पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित होकर दंडकारण्...और पढ़ें
Publish Date: Mon, 19 Oct 2026 08:46:23 PM (IST)Updated Date: Mon, 19 Oct 2026 09:18:00 PM (IST)
बस्तर में दशहरे का विशेष आयोजन।HighLights
- दंडकारण्य परियोजना के तहत पूर्वी पाकिस्तान से आए।
- यहां आकर बसे परिवारों ने बस्तर में जीवित रखी संस्कृति।
- बंगाली समाज के हुनर से बस्तर के काष्ठ शिल्प को विस्तार।
अनिमेष पाल, जगदलपुर। शाम ढलते ही जगदलपुर के दुर्गापूजा पंडाल रोशनी से जगमगा उठे। कहीं शंखनाद गूंजा, तो कहीं ढाक की थाप ने बंगाल की यादें ताजा कर दीं। पारंपरिक परिधानों में सजे परिवार, मां दुर्गा के दर्शन को पहुंचते श्रद्धालु और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में जुटे बच्चे। शुक्रवार को षष्ठी पूजा के साथ बंगाली समाज का दुर्गोत्सव शुरू हुआ। बंगाल से सैकड़ों किलोमीटर दूर बस्तर की धरती पर उमड़ा यह उल्लास केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि विस्थापन के दर्द के बीच अपनी संस्कृति को सहेजने की कहानी भी है।
जगदलपुर में 10 हजार से अधिक बंगाली समाज के लोग रहते हैं। इनमें बड़ी संख्या उन परिवारों के वंशजों की है, जो पूर्वी पाकिस्तान से विस्थापित होकर दंडकारण्य परियोजना के तहत बस्तर पहुंचे थे। अपनी जन्मभूमि, घर और परिचित परिवेश छोड़कर आए इन परिवारों ने यहां नई जिंदगी बसाई, लेकिन भाषा, खानपान, पूजा-पद्धति और सांस्कृतिक पहचान को नहीं छोड़ा।
शहर के बंगीय समाज, मैत्री संघ, मिलन संघ, आड़ावाल, धरमपुरा नंबर एक व दो और रेलवे कालोनी में दुर्गापूजा आयोजित की जा रही है। सुबह धार्मिक अनुष्ठानों और शाम को सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के बीच समाज के लोग एक साथ जुटे।
बंगीय समाज के अध्यक्ष मनोरंजन राय के अनुसार, दुर्गोत्सव केवल पूजा नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता और नई पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का अवसर है। इस सांस्कृतिक विरासत का रिश्ता बस्तर की शिल्प परंपरा से भी जुड़ता है। बंगाली समुदाय के कई परिवार मूर्तिकला और काष्ठ शिल्प के काम से जुड़े हैं। उनके हुनर और स्थानीय कारीगरों के अनुभव का मेल क्षेत्र की कलात्मक परंपराओं को आगे बढ़ाने में योगदान देता है।
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दंगों और विस्थापन का दर्द, बस्तर में नई जिंदगी
- 1947 में भारत विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान में रहने वाले अनेक हिंदू परिवारों को सांप्रदायिक तनाव, हिंसा और असुरक्षा का सामना करना पड़ा।
- बाद के वर्षों में भी कई घटनाओं ने परिवारों को पलायन के लिए मजबूर किया। घर, जमीन और पुरानी स्मृतियां छोड़कर निकले लोगों के लिए यह केवल जगह बदलना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से बिछड़ने का दर्द था।
- विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए भारत सरकार ने दंडकारण्य परियोजना शुरू की। इसके तहत पूर्वी पाकिस्तान से आए अनेक बंगाली परिवार तत्कालीन मध्य प्रदेश के बस्तर सहित दंडकारण्य के विभिन्न क्षेत्रों में बसाए गए।
- बस्तर के जगदलपुर, पखांजूर, रायपुर में माना और ओडिशा के मलकानगिरी में बंगाली समुदाय की बड़ी बस्तियां है।
- नए परिवेश में जीवन शुरू करने की चुनौतियों के बीच उन्होंने अपनी भाषा, रीति-रिवाज और पूजा-पद्धति को सहेजकर रखा।
- समय के साथ उनकी नई पीढ़ियां बस्तर के सामाजिक जीवन का हिस्सा बन गईं।
- आज जगदलपुर में बंगाल की परंपरा के अनुरूप होने वाली दुर्गापूजा उस यात्रा की गवाह है, जिसमें विस्थापन के दर्द के बीच संस्कृति ने नई जमीन पर अपनी जड़ें जमाईं।