
धर्म डेस्क। विश्व का सबसे अनोखा और 75 दिनों तक चलने वाला 'बस्तर दशहरा' अब अपने सबसे खास और अलौकिक मोड़ पर पहुंच चुका है। जहां पूरे देश में दशहरा रावण दहन के लिए जाना जाता है, वहीं बस्तर में यह पर्व रावण वध के स्थान पर देवी-देवताओं के संगम, सदियों पुरानी जनजातीय आस्था और सामूहिक भाईचारे का प्रतीक है।
आसपास के सैकड़ों दूर-दराज के गांवों से आए ग्रामीण अपने ग्राम-देवताओं की डोलियों और छत्रों के साथ जगदलपुर पहुंच चुके हैं, जिससे पूरा शहर भक्ति और उत्सव के रंग में रंग गया है।
1. मावली परघाव (देवी मां की भावुक अगवानी)
मां मावली को बस्तर की कुलदेवी मां दंतेश्वरी की बहन माना जाता है। दंतेवाड़ा से जब मां मावली की डोली और मां दंतेश्वरी का छत्र जगदलपुर पहुंचता है, तो राजपरिवार और सेवादार पारंपरिक वाद्ययंत्रों (मोहरी, तुड़ही और ढोल) की गूंज के साथ उनका भव्य स्वागत करते हैं। यह रस्म दो बहनों के मिलन और बस्तर की सांस्कृतिक आत्मीयता को दर्शाती है।
2. भीतर रैनी (8 पहियों वाले विशाल रथ की चोरी)
बस्तर दशहरा का सबसे बड़ा आकर्षण 8 पहियों वाला विशाल लकड़ी का 'विजय रथ' होता है। 'भीतर रैनी' की रात स्थानीय माड़िया और मुरिया जनजाति के लोग इस भारी-भरकम रथ को खींचकर जगदलपुर शहर से दूर कुम्हड़ाकोट के जंगलों में ले जाते हैं। यह सदियों पुरानी परंपरा राजा से अपनी स्वायत्तता और अधिकार जताने का एक प्रतीकात्मक तरीका है।
3. बाहर रैनी (राजपरिवार का कुम्हड़ाकोट आगमन और नवाखाई)
रथ चोरी होने के अगले दिन बस्तर राजपरिवार के सदस्य (कमलचंद्र भंजदेव) कुम्हड़ाकोट के जंगलों में पहुंचते हैं। वहां वे ग्रामीणों के साथ बैठकर 'नवाखाई' (नए अन्न का प्रसाद) ग्रहण करते हैं और उनसे आदरपूर्वक रथ को वापस शहर ले जाने का आग्रह करते हैं। यह रस्म शासक और प्रजा के बीच के गहरे जुड़ाव को दिखाती है।
4. मुरिया दरबार (ऐतिहासिक लोक-संसद)
इस परंपरा में बस्तर के माझी, चालकी और ग्रामीण प्रतिनिधि एक साथ बैठकर क्षेत्र के विकास, जन-समस्याओं और पूजा-विधानों पर खुलकर चर्चा करते हैं। इस बार के मुरिया दरबार की गरिमा और बढ़ जाएगी, क्योंकि इसमें देश की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु स्वयं शामिल होकर ग्रामीणों के विचार सुनेंगी।
5. कुटुंब जात्रा (देवी-देवताओं की अश्रुपूरित विदाई)
75 दिनों के इस लंबे उत्सव का अंत 'कुटुंब जात्रा' से होता है। इस दिन बस्तर के कोने-कोने से पधारे देवी-देवताओं के प्रतीकों और डोलियों की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और उन्हें सम्मानपूर्वक उनके मूल गांवों के लिए विदा किया जाता है।
बस्तर दशहरा में महाष्टमी की मध्यरात्रि को 'निशा जात्रा' की एक अत्यंत रहस्यमयी और गुप्त पूजा निभाई जाती है। आधी रात के सन्नाटे और 'मोहरी' वाद्ययंत्र की गंभीर गूंज के बीच बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव मुख्य यजमान के रूप में इस अनुष्ठान को पूरा करते हैं।
बलि विधान में बदलाव का इतिहास: रियासतकाल में महाष्टमी की रात हजारों भैंसों की बलि दी जाती थी। समय के साथ कानून और जन-जागृति के बाद भैंसों की जगह बकरों की बलि दी जाने लगी। वर्तमान में इसे सीमित करते हुए अब केवल 11 बकरों की प्रतीकात्मक बलि दी जाती है।
खमेश्वरी गुड़ी का महत्व: अनुपमा थियेटर के पास स्थित 'निशा जात्रा गुड़ी' (खमेश्वरी गुड़ी) सालभर बंद रहती है और केवल महाष्टमी की रात इस अनुष्ठान के लिए खोली जाती है। मान्यता है कि यहां मां दंतेश्वरी, मां मानिकेश्वरी और बस्तर के सभी देवी-देवताओं का वास है।
विभिन्न मंदिरों में बलि और सात्विक भोग: निशा जात्रा मंदिर के अलावा माता मंदिर में 2, राजमहल की सिंहड्योढ़ी में 2 और काली मंदिर में 1 बकरे की बलि दी जाती है-
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