
धर्म डेस्क। संस्कारधानी में कुछ दरबार ऐसे हैं, जहां आस्था समय के साथ पुरानी नहीं होती, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी और गहरी होती जाती है। चारखंबा-मिलौनीगंज स्थित बूढ़ी खेरमाई का दरबार ऐसा ही एक प्राचीन आस्था केंद्र है। यहां कोई परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना लेकर पहुंचता है, तो कोई आरोग्य और मंगल की कामना करता है।
किसी के लिए माता का दरबार पूर्वजों की विरासत है, तो किसी के लिए संकट में संबल और मनोकामना पूरी होने का विश्वास।
शारदीय नवरात्र में घटस्थापना, जवारा रोपण, मनोकामना ज्योति और सामूहिक आरती के बीच मंदिर परिसर भक्ति के रंग में रंग जाता है।
मां के दर्शन के लिए पहुंचते श्रद्धालु बताते हैं कि बूढ़ी खेरमाई केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि पीढ़ियों से संजोए विश्वास, पारिवारिक संस्कार और लोकआस्था की जीवंत धरोहर हैं।
बूढ़ी खेरमाई को मां धूमावती के स्वरूप में भी पूजा जाता है। देवी के इस स्वरूप के प्रति श्रद्धा और साधना की विशिष्ट परंपराएं हैं। भक्तों के लिए माता का दरबार वह स्थान है, जहां वे अपनी व्यथा कह सकते हैं और मन में आशा का दीप जला सकते हैं। यहां बाना अर्पित करने की परंपरा भी विशेष रूप से उल्लेखित की जाती है। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार माता के चरणों में बाना चढ़ाते हैं। नवरात्र में दर्शन-पूजन के साथ जवारा से जुड़ी परंपराएं भी मंदिर की विशिष्ट पहचान बनती हैं।
माता के दरबार में आने वाले अनेक श्रद्धालुओं के लिए यह विश्वास उनके परिवार की विरासत है। बुजुर्गों के साथ मंदिर आने वाले बच्चे धीरे-धीरे उसी परंपरा का हिस्सा बनते हैं। किसी परिवार में नए कार्य का शुभारंभ माता के दर्शन से होता है, तो कोई सुख-दुख के प्रत्येक पड़ाव पर उनका स्मरण करता है। नवरात्र के दिनों में मनोकामना ज्योति प्रज्वलित करने वाले श्रद्धालु अपनी प्रार्थनाओं को ज्योति के साथ जोड़ते हैं। सामूहिक आरती में जब घंटियों की ध्वनि और जयकारे गूंजते हैं, तब व्यक्तिगत आस्था सामूहिक भक्ति का रूप ले लेती है।
- पंडित सौरभ दुबे, आराधक
मां के दरबार में श्रद्धालु केवल कुछ मांगने नहीं आते, वे अपना विश्वास सौंपने भी आते हैं। उनके लिए माता के सामने सिर झुकाना मन को हल्का करने, संकट में धैर्य पाने और जीवन में मंगल की आशा जगाने का माध्यम है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा बताती है कि मंदिरों की पहचान केवल उनकी प्राचीनता से नहीं बनती, बल्कि उन भावनाओं से बनती है, जिन्हें लोग अपने जीवन में स्थान देते हैं। बूढ़ी खेरमाई का दरबार इसी लोकविश्वास का प्रतीक है, जहां नवरात्र के नौ दिनों में ही नहीं, वर्ष भर श्रद्धा का दीप जलता रहता है।
- असीम त्रिवेदी भक्त