मन्नत पूरी होने पर आंगन में सजती है ‘कोसी’, जानिए छठ में इस रस्म को करने का महत्व
लोक आस्था के चार दिवसीय महापर्व छठ में 'कोसी भरना' एक अत्यंत पावन और भावनात्मक परंपरा है, जिसे छठी मइया से मांगी गई किसी विशेष मन्नत (संतान, स्वास्थ्य, समृद्धि) के पूर्ण होने पर कृतज्ञता स्वरूप निभाया जाता है।
Publish Date: Sun, 01 Nov 2026 06:23:49 PM (IST)Updated Date: Sun, 01 Nov 2026 06:23:49 PM (IST)
छठी मइया से मांगी मन्नत पूरी होने पर 'कोसी' भरी जाती हैHighLights
- छठी मइया से मांगी मन्नत पूरी होने पर 'कोसी' भरी जाती है
- गन्ने के पवित्र मंडप के नीचे मिट्टी के हाथी-दिए रखे जाते हैं
- गन्ने का मंडप-हाथी शुभता और शक्ति का माना जाता
धर्म डेस्क। लोक आस्था के महापर्व छठ की तैयारियों के बीच घर-घर में एक खास परंपरा की चर्चा है। यह परंपरा है "कोसी भरना"। शाम होते ही आंगन या छत पर गन्नों का मंडप सजता है, दीयों की रोशनी जगमगाती है और महिलाएं छठ के गीत गाती हैं। इसी मंडप के नीचे मिट्टी की कोसी रखकर छठी मइया और सूर्य देव का आभार जताया जाता है।
क्या है कोसी भरने की परंपरा?
छठ व्रत करने वाले परिवारों में मान्यता है कि जब छठी मइया से मांगी गई कोई मन्नत पूरी हो जाती है, तो उसके बदले आभार स्वरूप कोसी भरी जाती है। यह मन्नत संतान की प्राप्ति, बच्चों की सलामती, परिवार की सुख-शांति, अच्छी सेहत, नौकरी या किसी कठिन काम के पूरा होने से जुड़ी हो सकती है।
कोसी असल में मिट्टी का एक खास बर्तन या दीया-नुमा पात्र होता है। इसे फल, ठेकुआ और दूसरे प्रसाद से भरकर पूजा के स्थान पर रखा जाता है। इसी वजह से इसे "कोसी भरना" कहते हैं।
कब और कैसे भरी जाती है कोसी
- परंपरा के अनुसार कोसी आमतौर पर छठ के तीसरे दिन, यानी संध्या अर्घ्य वाले दिन, भरी जाती है। कई परिवार इसे अगली सुबह के उषा अर्घ्य के समय भी भरते हैं। इसकी विधि इस तरह है।
- जगह की सफाई: पहले आंगन, छत या घाट के किनारे की जगह को साफ किया जाता है और कई जगह गोबर या गंगाजल से पवित्र किया जाता है।
- गन्ने का मंडप: चार, पांच या उससे ज्यादा गन्ने खड़े करके ऊपर से बांधे जाते हैं। इससे छोटा-सा मंडप तैयार होता है। इसे लाल या पीले कपड़े, आम के पत्तों और फूलों से सजाया जाता है।
- मिट्टी का हाथी: मंडप के नीचे मिट्टी का हाथी रखा जाता है। उसके ऊपर कलश या दीया सजाया जाता है।
- कोसी की स्थापना: हाथी के आसपास मिट्टी की कोसी रखी जाती है। परिवार की मान्यता के अनुसार इनकी संख्या 5, 7, 12 या 24 तक हो सकती है।
- प्रसाद से भराई: हर कोसी में ठेकुआ, फल, सुथनी, अदरक, हल्दी का पौधा, नारियल, केला, सिंघाड़ा और मौसमी फल रखे जाते हैं।
- दीप और पूजा: कोसी के चारों ओर दीये जलाए जाते हैं। धूप-दीप के साथ पूजा होती है। कई घरों में हवन भी किया जाता है।
- लोकगीत और परिक्रमा: महिलाएं छठ के पारंपरिक गीत गाती हैं। व्रती और परिवार के लोग श्रद्धा से पूजा करते हैं।
गन्ने का मंडप क्यों बनाया जाता है?
छठ पूजा में गन्ने का खास महत्व है। लोक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार इसके कई कारण बताए जाते हैं।
- पूजा स्थल का प्रतीक: गन्ने का मंडप एक छोटे मंदिर या यज्ञ-मंडप जैसा माना जाता है। इसके नीचे बैठकर पूजा करने से स्थान पवित्र हो जाता है।
- मिठास और समृद्धि: गन्ना मिठास का प्रतीक है। माना जाता है कि इससे जीवन में मिठास और घर में खुशहाली आती है।
- सूर्य की ओर बढ़ता गन्ना: गन्ने की लंबी, सीधी डंडियां आसमान और सूर्य की ओर उठती हैं। इसे सूर्य उपासना और ऊंचाई की ओर बढ़ने का प्रतीक माना जाता है।
- नई फसल का आभार: यह समय गन्ने की फसल का होता है। किसान और ग्रामीण परिवार नई फसल का पहला हिस्सा भगवान को अर्पित करते हैं।
- प्रकृति की पूजा: छठ पूरी तरह प्रकृति से जुड़ा पर्व है। इसमें सूर्य, जल, मिट्टी, फल, गन्ना और बांस के सूप, सब मिलकर पूजा का हिस्सा बनते हैं।
- शुद्धता की भावना: गन्ने को शुद्ध और सात्विक माना जाता है, इसलिए पूजा में इसका उपयोग शुभ समझा जाता है।
मिट्टी के हाथी का क्या है महत्व?
कोसी की सजावट में मिट्टी का हाथी भी जरूरी माना जाता है। हाथी को समृद्धि, शक्ति और शुभता का प्रतीक समझा जाता है। इसे मंडप के नीचे रखकर उसके ऊपर दीया जलाया जाता है, ताकि घर में सुख-संपन्नता बनी रहे।
कोसी में क्या-क्या रखा जाता है?
कोसी और पूजा की थाली में आमतौर पर ये चीजें शामिल होती हैं।
- ठेकुआ और चावल के लड्डू
- केला, नारियल, सेब, संतरा, अनानास और मौसमी फल
- सिंघाड़ा, सुथनी, शकरकंद और अदरक-हल्दी का पौधा
- गन्ना
- पान, सुपारी और अक्षत
- दीया, धूप और अगरबत्ती
- सिंदूर, फूल और आम के पत्ते
आस्था में डूबे परिवार
छठ के दिनों में पूरा परिवार एक साथ जुटता है। दूर-दराज में रहने वाले लोग भी घर लौट आते हैं। आंगन में कोसी सजते ही माहौल भक्तिमय हो जाता है। बच्चे उत्साह से दीये जलाने में हाथ बंटाते हैं और बुजुर्ग परंपराओं की कहानियां सुनाते हैं। महिलाएं मिलकर छठी मइया के गीत गाती हैं, जिनसे पूरा वातावरण गूंज उठता है।
ध्यान देने वाली बातें
- कोसी भरने की विधि और संख्या हर परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
- पूजा की जगह और सामग्री की शुद्धता का खास ध्यान रखा जाता है।
- खुले में दीये जलाते समय सुरक्षा का ध्यान रखें, खासकर बच्चों को आग से दूर रखें।
- घाट पर जाते समय भीड़ और पानी की गहराई को लेकर सावधानी बरतें।
- विधि को लेकर कोई संशय हो तो घर के बुजुर्गों या अपने पुरोहित से सलाह लें।
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