
धर्म डेस्क। भारत में सूर्य देव को ऊर्जा, जीवन और प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। आमतौर पर पूजा-पाठ में उगते सूर्य को शुभता और नई शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन बिहार के सबसे प्रमुख लोकपर्व छठ में एक ऐसी परंपरा है, जो इसे बाकी पर्वों से अलग बनाती है। यहां व्रती पहले डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं और अगले दिन उगते सूर्य की पूजा करते हैं। सवाल है कि आखिर छठ में अस्त होते सूर्य को इतना महत्व क्यों दिया जाता है?
छठ पूजा में तीसरे दिन शाम को व्रती नदी, तालाब या जलाशय में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इसे संध्या अर्घ्य कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सूर्य देव दिनभर संसार को प्रकाश और ऊर्जा देते हैं। ऐसे में उनके अस्त होने के समय भी पूजा करके उनके प्रति आभार व्यक्त किया जाता है।
इस परंपरा को जीवन के एक महत्वपूर्ण संदेश से भी जोड़कर देखा जाता है। जिस तरह उगते सूर्य का स्वागत किया जाता है, उसी तरह अस्त होते सूर्य को भी सम्मान दिया जाता है। यह सिखाता है कि जीवन में सिर्फ सफलता और नई शुरुआत ही नहीं, बल्कि ढलते समय और कठिन दौर का भी सम्मान करना चाहिए।
हालांकि, यह भावार्थ धार्मिक परंपरा की एक व्याख्या है, छठ के मूल अनुष्ठान का कोई एकमात्र आधिकारिक अर्थ नहीं।
छठ पूजा चार दिनों तक चलने वाला पर्व है। इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है। दूसरे दिन खरना किया जाता है, जबकि तीसरे दिन व्रती निर्जला उपवास रखते हुए शाम को डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। चौथे और अंतिम दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया जाता है।
शाम और सुबह के दोनों अर्घ्य इस पर्व के सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान हैं। शाम का अर्घ्य अस्त होते सूर्य को समर्पित होता है, जबकि सुबह का अर्घ्य नई सुबह और जीवन की निरंतरता का प्रतीक माना जाता है।
बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में छठ का विशेष महत्व है। इस पर्व में केवल परिवार ही नहीं, बल्कि पूरा समुदाय घाटों पर एक साथ जुटता है। महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं, बांस के सूप और दउरा में फल, ठेकुआ और अन्य प्रसाद सजाए जाते हैं।
छठ की खास बात यह भी है कि इसमें सूर्य के साथ जल और प्रकृति को भी विशेष महत्व दिया जाता है। व्रती जल में खड़े होकर अर्घ्य देते हैं। इससे यह पर्व ग्रामीण जीवन, कृषि और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति सम्मान की भावना से भी जुड़ता है।
दरअसल, छठ में डूबते सूर्य को अर्घ्य देना केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि कृतज्ञता और संतुलन का संदेश देने वाली परंपरा भी है। यह पर्व याद दिलाता है कि प्रकृति से मिलने वाली ऊर्जा और जीवन के हर चरण का सम्मान करना जरूरी है।
यह भी पढ़ें- मन्नत पूरी होने पर आंगन में सजती है ‘कोसी’, जानिए छठ में इस रस्म को करने का महत्व