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Dol Gyaras 2026: क्यों मनाई जाती है डोल ग्यारस, इसे परिवर्तिनी, जलझूलनी, वामन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है

जलवा पूजा को कुआं पूजा भी कहते हैं। इस ग्यारस को परिवर्तिनी एकादशी, जलझूलनी एकादशी, वामन एकादशी के नाम से भी जन्माष्टमी के बाद आने वाली एकादशी को जलझू...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Mon, 21 Sep 2026 12:29:41 PM (IST)Updated Date: Mon, 21 Sep 2026 12:33:06 PM (IST)
Dol Gyaras 2026: क्यों मनाई जाती है डोल ग्यारस, इसे परिवर्तिनी, जलझूलनी, वामन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है
डोल ग्‍यारस

HighLights

  1. शुक्ल पक्ष एकादशी को भी एकादशी तिथियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
  2. शुक्ल पक्ष में पद्मिनी एकादशी का महत्व पुराणों में भी बताया गया है।
  3. कहा जाता है कि एकादशी से ज़्यादा फलदायी कोई व्रत नहीं है।

धर्म डेस्‍क। कृष्ण जन्माष्टमी के बाद आने वाली एकादशी को डोल ग्यारस कहते हैं। श्री कृष्ण के जन्म के अठारहवें दिन माता यशोदा ने उनकी जल पूजा (घट पूजा) की थी। इस दिन को डोल ग्यारस के रूप में मनाया जाता है। जल पूजा के बाद ही रस्में शुरू होती हैं। कई जगहों पर इसे सूरज पूजा और कुछ जगहों पर दश्तून पूजा कहते हैं।

जलवा पूजा को कुआं पूजा भी कहते हैं। इस ग्यारस को परिवर्तिनी एकादशी, जलझूलनी एकादशी, वामन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

शुक्ल-कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को चंद्रमा की ग्यारह कलाओं का असर जीवों पर पड़ता है। नतीजतन, शरीर की हालत और मन की बेचैनी अपने आप बढ़ जाती है। इसलिए, व्रत रखकर सेहत बनाए रखना और इष्ट पूजा के ज़रिए मन को कंट्रोल करना एकादशी व्रत की रस्में हैं और मुख्य रूप से यही की जाती हैं।


डोल ग्यारस के मौके पर कृष्ण मंदिरों में पूजा-अर्चना की जाती है। भगवान कृष्ण की मूर्ति को 'डोल' (रथ) में रखकर जुलूस निकाला जाता है। इस मौके पर कई गांवों और शहरों में मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। इसके साथ ही, भगवान राधा-कृष्ण के सजे हुए डोल (रथ) जुलूस में निकाले जाते हैं। इसके साथ ही, अखाड़े और कलाकारों के प्रदर्शन सभी को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

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वैसे भी, सनातन धर्म में एकादशी तिथि (ग्यारस) को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। माना जाता है कि डोल ग्यारस का व्रत किए बिना जन्माष्टमी का व्रत पूरा नहीं होता है। शुक्ल पक्ष की एकादशी को भी एकादशी तिथियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। शुक्ल पक्ष में पद्मिनी एकादशी का महत्व पुराणों में भी बताया गया है। कहा जाता है कि एकादशी से ज़्यादा फलदायी कोई व्रत नहीं है। एकादशी के दिन शरीर में पानी की मात्रा जितनी कम होगी, व्रत पूरा करना उतना ही सात्विक होगा।

Dol Ekadashi 2022: डोल ग्यारस व्रत करने से मिलता है वाजपेय यज्ञ का फल

जन्माष्टमी के बाद आने वाली एकादशी को जलझूलनी एकादशी कहते हैं। इस दिन शाम होते ही मंदिरों में विराजमान देवताओं की मूर्तियां चांदी, तांबे, पीतल से बने विमानों में भक्ति धुनों पर इकट्ठा होने लगती हैं। ज़्यादातर विमान भक्तों के कंधों पर होते हैं।

मान्यता है कि मानसून के दौरान पानी गंदा हो जाता है, लेकिन एकादशी के दिन भगवान के जलाशयों में स्नान करने के बाद उसका पानी शुद्ध होने लगता है। सभी समुदायों के मंदिरों के विमान जुलूस में हिस्सा लेते हैं। मूर्तियों को विमान को कंधों पर उठाकर झुलाया जाता है। ऐसे समय में एकादशी को जल झूलनी कहा जाता है।

एकादशी के दिन व्रत रखकर भगवान कृष्ण की पूजा करने का विधान है। इस व्रत में पवित्रता का खास ध्यान रखा जाता है। इस व्रत को करने से सभी तरह की इच्छाएं पूरी होती हैं और रोग-शोक दूर होते हैं।

इस दिन देवता अपना निवास स्थान लेते हैं, इसलिए इसे स्थान परिवर्तनिनी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन व्रत करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। जो व्यक्ति भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करता है, तीनों लोकों में उसकी पूजा होती है।