Dussehra 2020: दशहरा का त्योहार पूरे देश में धूमधाम के साथ मनाया गया। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है। दशहरा हर साल अश्विन मास की दशमी तिथि को मनाया जाता है। दशहरा को विजयादशमी के नाम से भी जानते हैं। विजयादशमी के दिन रावण फूंकने की भी परंपरा है। पौराणिक कथा के अनुसार, इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने लंकापति रावण का वध किया था। भगवान राम के रावण पर विजय प्राप्त करने के कारण ही इस दिन को विजयादशमी कहा जाता है। इसके अलावा इस दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का भी वध किया था। हालांकि इस साल दशहरा की तारीख को लेकर लोगों के बीच कंफ्यूजन है। नवरात्रि में 9 दिनों तक आदिशक्ति की आराधना के बाद विजयादशमी को हर व्यक्ति अपने जीवन में विजय प्राप्ति के लिए शस्त्रों की पूजा करता है। इस दिन मां दुर्गा, देवी अपराजिता, मां काली की आराधना के साथ शस्त्र पूजा की जाती है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल दशहरा का त्योहार 25 अक्टूबर को मनाया जाएगा। दशहरा, दिवाली से ठीक 20 दिन पहले मनाया जाता है। हालांकि इस साल नवरात्रि 9 दिन के न होकर 8 दिन में ही समाप्त हो रहे हैं। इसके पीछे का कारण है- अष्टमी और नवमी का एक ही दिन पड़ना।

विजयादशमी पर इस देवी और वृक्ष की होगी पूजा, जानें मुहूर्त और महत्व

Dussehra Shastra Puja 2020: शारदीय नवरात्रि में महानवमी के हवन के बाद दुर्गा पूजा अपने समापन की ओर अग्रसर होता है। नवरात्रि की दशमी ति​थि यानी विजयादशमी या दशहरा को विशेष पूजा का आयोजन होता है। विजयादशमी के दिन देवी अपराजिता, शमी वृक्ष और शस्त्र पूजा की जाती है। इस वर्ष विजयादशमी 25 अक्टूबर दिन रविवार को है। इस दिन महानवमी और दशमी दोनों ही हैं। दशमी के दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था और भगवान श्रीराम ने रावण वध कर लंका विजय की थी, इसलिए दशमी को विजयादशमी के रुप में मनाते हैं। विजयादशमी या दशहरा को असत्य पर सत्य की जीत के रुप में देखा जाता है। आइए जानते हैं कि विजयादशमी के दिन देवी अपराजिता, शमी वृक्ष और शस्त्र पूजा का मुहूर्त और महत्व क्या है। दशमी तिथि का प्रारम्भ 25 अक्टूबर को सुबह 07:41 बजे से हो रहा है, जो 26 अक्टूबर 26 को सुबह 09:00 बजे तक है। 25 अक्टूबर को दशमी तिथि का अपराह्नकाल में पूर्ण व्याप्ति है, इसलिए 25 अक्टूबर को दशहरा या विजयादशमी होगा।

दशमी तिथि समाप्त - 26 अक्टूबर को सुबह 08:59 मिनट तक रहेगी। दशहरा के दिन में सीमा उल्लंघन की भी पता है और तो और अपने जो साधन है गाड़ी घर व्यवसाय की जगह शब्दों के साथ करके पवित्र करके उनकी पूजा की जाती है और तो और उस दिन शमी की पत्तों का दान किया जाता है और जब हम नए वस्त्र परिधान करके गांव की सीमा लांड कर आ जाते हैं घर में तब हमारे घर की महिलाएं हमारा ऑक्शन करके मतलब यह की हमारा दिए की थाली से पूजा की जाती है कुछ मीठा खिलाया जाता है और हमारी एक नई शुरुआत हो जाती है।

दशमी तिथि प्रारंभ - 25 अक्टूबर को सुबह 07:41 मिनट से

विजय मुहूर्त - दोपहर 01:55 मिनट से 02 बजकर 40 तक।

अपराह्न पूजा मुहूर्त - 01:11 मिनट से 03:24 मिनट तक।

दशहरा: शस्त्र पूजा मुहूर्त

दशहरा के दिन शस्त्र पूजा के लिए विजय मुहूर्त उत्तम माना जाता है। इस मुहूर्त में किए गए कार्य में सफलता अवश्य प्राप्त होती है। विजयादशमी के दिन शस्त्र पूजा के लिए विजय मुहूर्त दोपहर 13:57 बजे से दोपहर 14:42 बजे तक है। इस समयकाल में आपको अपने शस्त्रों की पूजा करनी चाहिए।

अपराजिता देवी की पूजा विधि

अक्षत्, फूल, दीपक, गंध, धूप आदि के सा​थ अष्टदल पर अपराजिता देवी की मूर्ति स्थापना करें। ओम अपराजितायै नमः मंत्र का उच्चारण कर देवी की स्थापना की जाती है। देवी के दाएं भाग में जया तथा बाएं भाग में विजया की स्थापना होगी। फिर आवाहन पूजा करें।

प्रार्थना मंत्र

चारुणा मुख पद्मेन विचित्रकनकोज्वला।

जया देवि भवे भक्ता सर्व कामान् ददातु मे।।

काञ्चनेन विचित्रेण केयूरेण विभूषिता।

जयप्रदा महामाया शिवाभावितमानसा।।

विजया च महाभागा ददातु विजयं मम।

हारेण सुविचित्रेण भास्वत्कनकमेखला।

अपराजिता रुद्ररता करोतु विजयं मम।।

शमी की पूजा

शमी पूजा विशेष कर क्षत्रिय करते हैं। शमी वृक्ष की पूजा दशहरा वाले दिन प्रदोष काल में की जाती है। कहा जाता है कि पांडवों ने महाभारत के युद्ध के समय अपने अस्त्र-शस्त्र शमी के वृक्ष पर छिपाए थे, जिससे उन्हें युद्ध में विजय मिली। हालांकि शमी को दृढ़ता तथा तेजस्विता का प्रतीक माना जाता है। उसमें अन्य वृक्षों की तुलना में अग्नि तत्व ज्यादा होता है। हम भी शमी की तरह ही तेजस्वी तथा दृढ़ हों, इसलिए इसकी पूजा की जाती है।

दशहरे को है अबूझ मुहूर्त, कर सकते हैं मनचाही खरीदारी

Dussehra 2020: शारदीय नवरात्र पर्व की शुरुआत शनिवार 17 अक्टूबर से सर्वार्थसिद्धि योग में हुई और नवरात्र 25 अक्टूबर तक रहेंगे। शारदीय नवरात्रि की धूम पूरे देश में है। माता की भक्ति में लीन भक्तों को अब अष्टमी, नवमी और दशहरा का इंतजार है। इस साल अष्टमी और नवमी तिथि एक साथ पड़ने के कारण लोगों के बीच अष्टमी और नवमी तिथि को लेकर असमंजस है। इस दिन यानी रविवार को सुबह नवमी और दोपहर से दशमी तिथि शुरू हो जाएगी। इस कारण देश में कई जगहों पर इसी दिन दशहरा मनाया जाएगा। ज्योतिषाचार्य अनीष व्यास ने बताया कि अश्विन महीने के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि पर विजय मुहूर्त में विजयदशमी पर्व मनाया जाता है। शुभ मुहूर्त और तिथि का से संयोग 25 अक्टूबर को ही बन रहा है। दशहरे को अबूझ मुहूर्त माना गया है। यानी इस दिन प्रॉपर्टी, व्हीकल और हर तरह की खरीदारी के लिए शुभ मुहूर्त रहेगा। दशहरे पर देश भर में रावण के पूतले जलाएं जाएंगे। हालांकि इस बार कोरोना महामारी को देखते हुए आयोजन फीका रह सकता है। दशहरे के अगले दिन यानी 26 अक्टूबर को मां दुर्गा की मूर्ति का विसर्जन होगा। उस दिन सुबह 06:29 बजे से सुबह 08:43 बजे के मध्य दुर्गा विसर्जन कर देना चाहिए।

अष्टमी 24 और नवमी व दशहरा 25 को

नवरात्र की अष्टमी, नवमी और दशमी तिथि को लेकर मतभेद पर पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर के निदेशक विश्वविख्यात भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक अनीष व्यास ने बताया कि इस बार अष्टमी तिथि शनिवार को पूरे दिन रहने से 24 अक्टूबर को महाष्टमी मनाई जाएगी। इस दिन देवी महागौरी की पूजा की जाती है। इसके अगले दिन यानी 25 अक्टूबर का सूर्योदय नवमी तिथि में ही होगा और सुबह करीब 11:14 तक ये तिथि रहेगी। इस तरह शारदीय नवरात्रि में कन्या पूजन या कुमारी पूजा, महाष्टमी और महानवमी दोनों ही तिथियों को किया जाएगा। इसके बाद दशमी तिथि शुरू हो जाएगी।

कन्या पूजन के लिए शुभ मुहूर्त

कन्या पूजन के लिए बुलाई गयी कन्याओं की मां के समान पूजा की जाती है। उनकी सेवा के बाद उन्हें ख़ुशी ख़ुशी विदा करने से माता मुरादें पूरी करती हैं। इस लेख के माध्यम से जानते हैं कि इस साल पूजन के लिए शुभ मुहूर्त क्या है और किस विधि से इसे संपन्न करना है। कन्या या कंजक पूजन के लिए शुभ मुहूर्त। आप इन शुभ मुहूर्त पर भी कंजक बिठा सकते हैं: सुबह 06:41 से 08:13 सुबह 11:56 से दोहपर 12:47 तक दोहपर 02:28 से शाम 03:19 तक

कैसे करें कन्‍या पूजन

नवरात्रि का व्रत रखने वालों के लिए कंजक पूजना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, इसके बिना इनका व्रत अधूरा रह जाता है। ऐसी मान्यता है दुर्गा मैया को खुश करना है तो कंजक जरूर बिठाएं। इसके लिए कम से कम नौ कन्याएं होनी चाहिए। यदि नौ से अधिक बालिकाएं आती हैं तब भी कोई समस्या नहीं है। इन कन्याओं की आयु दो से दस साल तक की होनी चाहिए। नौ कन्या के साथ एक बालक (लंगुरिया) भी बिठाएं। एक एक करके सभी कन्या के पैरों को थाल में रख कर जल से धोएं और साफ़ कपड़े से पोंछ कर स्थान पर बिठाएं। माना जाता है कि इससे पापों का दमन होता है। अब पंक्ति से बैठी कन्याओं और बालक को तिलक लगाएं। उनके हाथ में मौली बांधे। अब उनको नए थाली में भोजन परोसें। उन्हें भोग लगाने के लिए इस दिन खासतौर पर हलवा-पूरी, चना तैयार किया जाता है। इसके साथ आप उन्हें मिठाई, प्रसाद और वस्त्र आदि भी दे सकते हैं।

पूजन के बाद यह करें

जब कन्याएं भोजन कर लें तब उन्हें मां दुर्गा का स्वरूप मानकर उनके चरण छूकर आशीर्वाद लें। यदि आपके जीवन में किसी तरह की कठिनाई है और माता का आशीर्वाद चाहते हैं तो कन्या पूजन के जरिए उनकी कृपा पा सकते हैं। एक बात का ध्यान रखिए कि कन्या जो है 9 साल से उम्र में छोटी होनी चाहिए खास करके प्रत्येक कन्या को अगर आप हरा कपड़ा हरा चूड़ी या हरे वस्त्र अगर दान करते हैं तो आपको बड़ा लाभ होगा तथा आपके कुंडली के अनुसार बुध का यह सबसे बड़ा कारगर उपाय साबित होगा जो हो जाएगा।

विजयादशमी या दशहरा का महत्व

भगवान ​श्रीराम ने माता सीता को रावण के चंगुल से मुक्त कराने के लिए लंका पर चढ़ाई की थी। रावण की राक्षसी सेना और श्रीराम की वानर सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ था, जिसमें रावण, मेघनाद, कुंभकर्ण जैसे सभी राक्षस मारे गए। रावण पर भगवान राम के विजय की खुशी में हर वर्ष दशहरा मनाया जाता है। वहीं, मां दुर्गा ने महिषासुर का अंत कर देवताओं और मनुष्यों को उसके अत्याचार से मुक्ति दी थी, उसके उपलक्ष में भी हर वर्ष दशहरा मनाया जाता है। श्री राम का लंका विजय तथा मां दुर्गा का महिषासुर मर्दिनी अवतार दशमी को हुआ था, इसलिए इसे विजयादशमी भी कहा जाता है। विजयादशमी या दशहरा बुराई पर अच्छाई तथा असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है।

Posted By: Navodit Saktawat

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