
रायपुर। Holi 2023: ब्रज क्षेत्र की होली की तर्ज पर राजधानी रायपुर में भी होली पर्व पर उमंग, उल्लास का माहौल छाया रहता है। एक ओर जहां 200 साल से अधिक दो पुराने मंदिरों में 40 दिवसीय रंगोत्सव में भगवान के चरणों में रंग-गुलाल अर्पित करने की परंपरा निभाई जाती है, वहीं सदरबाजार में शिव अवतारी माने जाने वाले सेठ नाथूराम की होली पर सात दिनों तक धूम मचती है। श्रद्धालु चंग-मृदंग की धुन पर राधा-कृष्ण की भक्ति से ओतप्रोत गीत गाकर इस मधुर पल का आनंद उठाते हैं।
होली खेलने के अलावा होलिका दहन की भी कुछ अनोखी परंपराओं का पालन किया जाता है। ऐतिहासिक महामाया मंदिर में होलिका दहन करके यहां से अग्नि ले जाकर दूसरे इलाकों में दहन करने की परंपरा निभाई जा रही है। दूसरी ओर एक इलाका ऐसा भी है जहां होलिका दहन को अशुभ माना जाता है, यहां 100 साल से ज्यादा समय से होलिका दहन नहीं किया जा रहा है। होली पर आधारित ऐसी ही रोचक जानकारी दे रहे हैं, नईदुनिया के संवाददाता श्रवण शर्मा।

गोकुल चंद्रमा हवेली मंदिर
ऐतिहासिक बूढ़ातालाब से चंद कदमों की दूरी पर सराफा बाजार की गली में 200 साल पुराना गोकुल चंद्रमा हवेली मंदिर है। यहां भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप की पूजा की जाती है, जो गोकुल चंद्रमा के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रज क्षेत्र के गोकुल गांव के बाद दूसरा मंदिर बूढ़ापारा में है, वैष्णव मत को मानने वाले लोग भगवान के साथ होली खेलने का आनंद उठाते हैं। यहां होली पर्व की शुरुआत वसंत पंचमी से हो चुकी है। खास आकर्षण रंगभरी एकादशी से लेकर धुलेंडी तक देखने को मिलता है। पुजारीजी पहले भगवान के चरणों और गालों पर रंग-गुलाल लगाते हैं। इसके पश्चात भगवान की ओर से श्रद्धालुओं पर रंगों की बौछार करते हैं। अरारोट, अबीर, टेसू के रंगों का ही उपयोग किया जाता है।
36 दिन तक एक रंग बाकी चार दिन सभी रंग
सेवादार भागवत साहू बताते हैं कि वसंत पंचमी से लेकर 36 दिनों तक भगवान को एक रंग लगाया जाता है। एकादशी से होलिका दहन तक दो, तीन और धुलेंडी पर सभी रंगों से होली खेली जाती है।
होलिका दहन पर मशाल
होलिका दहन पर मंदिर के भीतर लकड़ियां नहीं बल्कि मशाल प्रज्ज्वलित करके राल डालकर होलिका दहन की परंपरा निभाई जाती है।
मंदिर का पट खुलता है चार बार
मंदिर की सेवादार मीना पंडया बतातीं हैं कि बाल रूप भगवान को दूध, माखन, मिश्री का भोग अर्पित किया जाता है। सुबह से दोपहर तक मंदिर का पट चार बार खोला जाता है। हर बार भगवान को अलग-अलग तरह का भोग अर्पित करके भक्तों को प्रसाद वितरित किया जाता है। कुंज एकादशी तेरस का बगीचा में मिठाई की थाली सजाकर भोग लगाया जाता है।

200 साल से निकल रही सेठ नाथूराम की बरात
सदरबाजार इलाके में सेठ नाथूराम की पूजा-अर्चना करने की परंपरा निभाई जाती है। होली के पांच दिन पहले एकादशी तिथि पर सेठ नाथूराम की बरात धूमधाम से निकाली जाती है। प्रतिमा को नाहटा मार्केट में प्रतिष्ठापित किया जाता है। पांच दिनों तक पूजा करके राजस्थानी फाग गीत गाए जाते हैं। अंतिम दिन सराफा मार्केट में होली खेलने वाले सभी लोगों के लिए गोठ यानी रिसेप्शन में भोजन प्रसादी का आयोजन किया जाता है। होली के पश्चात प्रतिमा को पूरे सालभर एक अलग कमरे में रखा जाता है।
शिव अवतारी इलोजी के नाम से प्रसिद्ध
आयोजन समिति के वरिष्ठ सदस्य, सराफा बाजार के पूर्व अध्यक्ष हरख मालू एवं पूजा-अर्चना में सहयोग कर रहे ओमप्रकाश सेवग (ओम बाबा) बताते हैं कि 50 साल से वे सेठ नाथूराम की बरात में शामिल होने से लेकर अंतिम दिन तक आनंद उठाते हैं। दादा, परदादा के जमाने से सदरबाजार में यह परंपरा निभाई जा रही है। ऐसी मान्यता है कि राजस्थान के बिकानेर में सेठ नाथूराम को शिव अवतारी कहा जाता है, जिन्हें इलोजी के रूप में पूजा जाता है। राजस्थान से आने वाले पूर्वजों ने यह परंपरा शुरू की थी। यहां की होली देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। निसंतान दंपत्ति संतान प्राप्ति की कामना भी करते हैं।
गोपाल मंदिर सदरबाजार
कोतवाली थाने से चंद कदमों की दूरी पर स्थित 200 साल पुराने गोपाल मंदिर ओर बूढ़ापारा के बांके बिहारी मंदिर में भी 40 दिवसीय रंगोत्सव का पर्व मनाने की परंपरा निभाई जा रही है। यहां जुगलजोड़ी सरकार यानीी राधारानी और श्रीकृष्ण का श्रृंगार किया जाता है। आकर्षक हिंडोला सजाया जाता है। महिला मंडली द्वारा भजनों की प्रस्तुति दी जाती है। सभी समाज के लोग होली मनाने आते हैं।
खाटू श्याम मंदिर
समता कालोनी के खाटु श्याम मंदिर में दो दिवसीय फागुन उत्सव की धूम मचती है। एकादशी तिथि पर सैकड़ों श्रद्धालु राणी सती मंदिर से हाथों में निशान ध्वजा थामकर पांच किलोमीटर का सफर पैदल तय करके मंदिर पहुंचते हैं। रात्रि में अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है। रातभर जम्मा जागरण करके 56 भोग अर्पित किया जाता है। दूसरे दिन सवामणि का भोग लगाने श्रद्धालुओं की कतार लगती है। दोपहर को श्याम रसोई में भोजन प्रसादी ग्रहण करने हजारों लोग उमड़ते हैं। धुलेंडी वाले दिन खाटू श्याम दरबार में होली खेलने बच्चे, युवतियां लालायित रहते हैं।
लालपुर गांव में नहीं करते होलिका दहन
पचपेड़ीनाका से दो किलोमीटर दूर लालपुर गांव में 100 साल से अधिक समय से होलिका दहन नहीं किया जा रहा है। ऐसी मान्यता है कि एक बार होलिका दहन के दिन गांव में आग लग गई थी और खेत, खलिहान सब बर्बाद हो गया था। इसके बाद से गांव में कभी होलिका दहन नहीं किया गया। आसपास के सभी गांवों में दहन किया जाता लेकिन इस गांव में होलिका दहन नहीं किया जाता। गांव के बिझवारिन देवी मंदिर जिसे कुंवारी देवी माना जाता है, वहां पूजा-अर्चना करके दूसरे दिन होली खेली जाती है।
महामाया मंदिर की अग्नि से दहन
पुरानी बस्ती के ऐतिहासिक महामाया मंदिर में सैकड़ों साल से प्रज्वलित हो रही अखंड जोत से अग्नि लेकर मंदिर प्रांगण में होलिका दहन की परंपरा निभाई जाती है। पुजारी पं.मनोज शुक्ला बताते हैं कि मंदिर में दहन के पश्चात अन्य इलाकों के लिए यहीं से अग्नि ले जाकर होलिका दहन किया जाता है। यह परंपरा सैकड़ों साल से निभाई जा रही है।