
धर्म डेस्क। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला अखंड सौभाग्य का महापर्व 'करवा चौथ' भारतीय संस्कृति में दाम्पत्य निष्ठा, प्रेम और समर्पण का अनुपम उदाहरण है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और संकटों से रक्षा के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।
धार्मिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं में करवा चौथ के उद्भव को लेकर कई प्राचीन कथाएं मिलती हैं। सबसे पहले यह व्रत किसने रखा और किन परिस्थितियों में इसकी शुरुआत हुई, इसका उल्लेख सतयुग से लेकर महाभारत काल तक मिलता है।
आइए जानते हैं करवा चौथ के व्रत के इतिहास से जुड़ी 5 प्रमुख पौराणिक कथाएं-
मान्यताओं के अनुसार, करवा चौथ का पहला व्रत स्वयं शक्ति स्वरूपा माता पार्वती ने देवाधिदेव भगवान शिव के लिए रखा था-
पौराणिक काल में जब देवताओं और असुरों के बीच भीषण संग्राम छिड़ा, तो दानव भारी पड़ने लगे और देवताओं की पराजय का संकट गहरा गया। चिंतित देवताओं की रक्षा के लिए ब्रह्मदेव ने देव-पत्नियों को कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन निर्जला व्रत रखने का उपाय सुझाया।
देवियों ने पूर्ण निष्ठा से अपने पतियों की सुरक्षा और विजय के लिए व्रत किया। इस तपोबल के प्रभाव से देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की। माना जाता है कि तभी से संकट निवारण और पति की दीर्घायु के लिए यह व्रत लोक-परंपरा का हिस्सा बना।
महाभारत काल में भी करवा चौथ के व्रत का ऐतिहासिक संदर्भ मिलता है। जब अर्जुन नीलगिरी पर्वत पर तपस्या करने गए थे, तब शेष पांडवों पर कई गंभीर संकट आ गए थे।
व्याकुल द्रौपदी ने जब भगवान श्रीकृष्ण से रक्षा का उपाय पूछा, तो कन्हैया ने उन्हें कार्तिक मास की चतुर्थी का व्रत रखने को कहा। द्रौपदी द्वारा इस विधि-विधान का पालन करने के बाद पांडवों के सभी कष्ट दूर हुए और उनका राज-काज सुरक्षित रहा।
करवा चौथ का नाम जिस पतिव्रता स्त्री के नाम पर पड़ा, उसकी कथा सतीत्व के सामर्थ्य को दर्शाती है। एक बार एक पतिव्रता स्त्री 'करवा' के पति का पैर नदी में स्नान करते समय मगरमच्छ ने पकड़ लिया। पति की पुकार सुनकर करवा दौड़ी और अपने सतीत्व के बल पर एक कच्चे धागे से मगरमच्छ को बांध दिया।
करवा सीधे यमराज के पास पहुंची और पति के प्राण बचाने तथा मगरमच्छ को मृत्युदंड देने की मांग की। यमराज ने जब कहा कि मगरमच्छ की आयु अभी बाकी है, तो करवा ने अपने तपोबल से यमराज को ही भस्म करने की चेतावनी दे दी।
सती के तपोबल से भयभीत होकर यमराज ने मगरमच्छ को यमलोक भेज दिया और करवा के पति को चिरायु (दीर्घायु) होने का वरदान दिया।
करवा चौथ की पारंपरिक पूजा में इंद्रप्रस्थपुर के वेद शर्मा ब्राह्मण की पुत्री वीरावती की कथा विशेष रूप से सुनी जाती है। वीरावती ने विवाह के बाद पहली बार करवा चौथ का व्रत रखा। अत्यधिक भूख-प्यास से व्याकुल बहन की दशा भाइयों से नहीं देखी गई। उन्होंने पीपल के पेड़ की आड़ में आतिशबाजी और छलनी से कृत्रिम प्रकाश फैलाकर बहन को नकली चंद्रमा दिखा दिया और भोजन करा दिया।
छल से व्रत टूटने के कारण वीरावती का पति तुरंत अदृश्य (अचेत) हो गया। वीरावती को जब अपनी भूल का आभास हुआ, तो उसने पश्चाताप करते हुए पूरे एक वर्ष तक प्रत्येक माह की संकष्टी चतुर्थी का कठोर व्रत रखा। अगले वर्ष करवा चौथ पर विधिपूर्वक व्रत संपन्न होने पर माता पार्वती की कृपा से उसे उसका पति पुनः जीवित और स्वस्थ प्राप्त हुआ।
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