
धर्म डेस्क। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को 'पापांकुशा एकादशी' के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पावन तिथि पर उपवास रखकर भगवान श्री हरि विष्णु के 'पद्मनाभ' स्वरूप की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है।
शास्त्रों में विधान है कि जो साधक निष्काम अथवा सकाम भाव से पापांकुशा एकादशी का व्रत और पूजन करते हैं, उनके समस्त जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और विष्णु कृपा से कुल की 10 पीढ़ियों का उद्धार होकर अंत में मोक्ष (वैकुंठ) की प्राप्ति होती है। व्रत के पूर्ण फल की प्राप्ति के लिए पूजन के समय इस पौराणिक व्रत कथा का श्रवण अथवा पठन अवश्य करना चाहिए।
आइए जानते हैं पापांकुशा एकादशी की सम्पूर्ण पौराणिक व्रत कथा-
धर्मराज युधिष्ठिर ने एक बार लीलाधर भगवान श्री कृष्ण से जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा- हे जनार्दन! आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का क्या नाम है, तथा इसका क्या विधान और महत्व है? कृपा करके मुझे विस्तार से बताएं।
भगवान श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया- हे युधिष्ठिर! आश्विन शुक्ल एकादशी को 'पापांकुशा एकादशी' कहा जाता है। जिस प्रकार अंकुश से मतवाले हाथी को नियंत्रण में किया जाता है, उसी प्रकार यह एकादशी रूपी अंकुश मनुष्य के सभी पापों और दोषों का नाश कर देती है। इस व्रत को करने वाले साधक को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है और उसकी 10 पीढ़ियों (मातृ पक्ष, पितृ पक्ष और स्त्री पक्ष) का उद्धार हो जाता है। आइए, इसकी परम पवित्र कथा सुनिए:
प्राचीन काल में विंध्याचल पर्वत पर 'क्रोधन' नाम का एक अत्यंत क्रूर और पापी बहेलिया (शिकारी) निवास करता था। वह स्वभाव से दयाहीन, अधर्मी और हिंसक था। उसने अपने संपूर्ण जीवन में केवल जीवों की हत्या की, निरपराध प्राणियों को कष्ट पहुंचाया और हर प्रकार के दुष्कर्म किए।
समय चक्र बीतने के साथ जब क्रोधन का बुढ़ापा आया और उसका अंतिम समय निकट आ पहुंचा, तो यमराज के दूतों ने उसे प्रत्यक्ष दर्शन देकर चेतावनी दी- हे क्रोधन! कल तेरी आयु का अंतिम दिन है। कल हम तुझे बांधकर यमलोक ले जाएंगे, जहां तुझे अपने घोर पापों के लिए नरक की भयानक यातनाएं भोगनी पड़ेंगी।"
यमदूतों की बातें सुनकर महापापी क्रोधन भय से कांपने लगा। नरक की यातनाओं के विचार मात्र से दुःखी और भयाक्रांत होकर वह तत्काल महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुंचा। बहेलिए ने महर्षि के चरणों में गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया और कातर स्वर में प्रार्थना करने लगा-
‘हे ब्रह्मर्षि! मैंने जीवनभर केवल हिंसा, जीव-हत्या और पाप कर्म ही किए हैं। अब मेरा अंतिम समय आ गया है और मुझे यमलोक के नरक का भय सता रहा है। कृपा कर मुझे कोई ऐसा सुलभ उपाय या प्रायश्चित बताइए, जिससे मेरे समस्त पाप कट जाएं और मुझे मोक्ष की प्राप्ति हो सके।’
क्रोधन की व्यथा और पश्चाताप देखकर दयालु महर्षि अंगिरा ने कह- हे बहेलिए! भयभीत न हो। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली 'पापांकुशा एकादशी' का व्रत विधि-पूर्वक करो। इस दिन उपवास रखकर भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप का पूजन-अर्चन करने से श्री हरि की कृपा बरसेगी, तेरे समस्त जन्मों के पाप भस्म हो जाएंगे और तुझे मोक्ष मिल जाएगा।
महर्षि अंगिरा के वचनों से आश्वस्त होकर बहेलिया अपने घर लौट आया। आश्विन शुक्ल एकादशी आने पर क्रोधन न पूर्ण निष्ठा और नियमपूर्वक उपवास रखा, भगवान पद्मनाभ की पूजा-आरती की और रात्रिभर जागरण किया। अगले दिन द्वादशी तिथि को पारण कर व्रत पूर्ण किया।
पापांकुशा एकादशी के इस अलौकिक प्रभाव से बहेलिए के जीवनभर के समस्त महापाप क्षणभर में क्षय हो गए। जब उसका अंतिम समय आया, तो यमदूतों के स्थान पर भगवान विष्णु के पार्षद दिव्य रथ लेकर आए और क्रोधन आदरपूर्वक वैकुंठ धाम को प्रस्थान कर गया।
पापांकुशा एकादशी के दिन केवल व्रत ही नहीं, बल्कि दान-पुण्य का भी विशेष महत्व बताया गया है। जो व्यक्ति इस दिन निष्कपट भाव से अन्न, जल, छाता, जूते, तिल, भूमि और गौ दान करते हैं, उन्हें कभी भी यमराज के दर्शन नहीं करने पड़ते और वे अक्षय पुण्य के भागी बनते हैं।
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