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धर्म डेस्क। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र और फलदायी माना गया है, जिसे 'शरद पूर्णिमा', 'कोजागरी पूर्णिमा' या 'रास पूर्णिमा' कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की पावन रात्रि को भगवान श्री हरि विष्णु, धन-वैभव की देवी मां लक्ष्मी और चंद्रदेव की विधिवत पूजा-अर्चना करने से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
इस साल शरद पूर्णिमा की तारीख और चंद्रोदय कालीन पूजन को लेकर श्रद्धालुओं के बीच बनी असमंजस की स्थिति को उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पंडित आनंद भारद्वाज ने स्पष्ट कर दिया है।
आइए जानते हैं शरद पूर्णिमा 2026 की सही तिथि, चंद्र किरण में खीर रखने का समय, धार्मिक नियम और वर्जित कार्य-
उज्जैन पंचांग और वैदिक गणना के अनुसार, पूर्णिमा तिथि की समयावधि-
तिथियों का निर्णय:
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी समस्त सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। इस रात चंद्रदेव की शीतल किरणों से 'अमृत' तुल्य औषधीय गुण बरसते हैं।
25 अक्टूबर की रात 09:00 बजे के बाद दूध, चावल, चीनी और मेवों से बनी खीर को किसी बारीक कपड़े या पतली छलनी से ढककर खुले आसमान के नीचे (छत या आंगन में) रखें, ताकि उस पर चंद्र किरणें सीधे पड़ सकें। रातभर चंद्र किरणों के प्रभाव में रखी गई इस खीर को अगले दिन प्रातःकाल प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से आरोग्यता, मानसिक शांति और नेत्र ज्योति में वृद्धि होती है।
मान्यता है कि इस रात मां लक्ष्मी पृथ्वी लोक पर भ्रमण कर पूछती हैं- को जागर्ति?" (कौन जाग रहा है?)। जो भक्त रात्रि में जागकर पूजा-अर्चना करते हैं, मां लक्ष्मी उन पर अपार धन-धान्य की वर्षा करती हैं।
पंडित के अनुसार, शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए-
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