
धर्म डेस्क। शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा के पावन उत्सव के अंतिम दिन यानी विजयादशमी (20/21 अक्टूबर 2026) के अवसर पर बंगाली समुदाय में 'सिंदूर खेला' का भव्य और भावुक अनुष्ठान आयोजित किया जाता है। देश-विदेश के पंडालों में यह परंपरा अत्यंत हर्षोल्लास, 'स्त्री शक्ति' और सामूहिक एकता के साथ निभाई जाती है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्र के नौ दिनों में मां दुर्गा अपने बच्चों (लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिक, गणेश) के साथ अपने मायके (पृथ्वी लोक) आती हैं। विजयादशमी के दिन वे पुनः अपने ससुराल यानी कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के धाम लौटती हैं। बेटी की विदाई की इसी अनुभूति के साथ मां दुर्गा को भावपूर्ण विदाई दी जाती है।
आइए समझते हैं सिंदूर खेला, देवी बोरोन, धुनुची नृत्य और पान के पत्ते से जुड़ी प्रमुख परंपराएं-
मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन से ठीक पहले सुहागिन महिलाएं देवी मां की विशेष आरती और विदाई अनुष्ठान करती हैं, जिसे 'देवी बोरोन' (Devi Boron) कहा जाता है-
इस रस्म के दौरान महिलाएं पान के पत्ते को अपने हाथों में लेकर उससे मां दुर्गा के मुख मंडल (चेहरे) का स्पर्श करती हैं। मान्यता है कि पान का पत्ता शुभता, पवित्रता और मां के प्रति अनन्य प्रेम का प्रतीक है।
इसके बाद मां के मस्तक और चरणों में सिंदूर लगाया जाता है, उन्हें मिठाई और पान अर्पित कर सुखी और अखंड सौभाग्यवती रहने का आशीर्वाद मांगा जाता है।
देवी बोरोन के बाद महिलाएं एक-दूसरे के माथे, गालों और चेहरे पर सिंदूर लगाती हैं। यह उत्सव एक-दूसरे के वैवाहिक सुख, पति की दीर्घायु और समृद्धि की मंगलकामना के लिए मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं पारंपरिक रूप से लाल बॉर्डर वाली सफेद/लाल-सफेद साड़ी (लाल पाड़ साड़ी) और हाथों में शंखा-पोला (शंख और लाल चूड़ियां) धारण करती हैं।
यह परंपरा लगभग 400 साल पुरानी मानी जाती है। पूर्व काल में इसमें केवल विवाहित महिलाओं के शामिल होने का नियम था, परंतु आधुनिक सामाजिक बदलाव के साथ अब इसमें विधवा, तलाकशुदा, अविवाहित और किन्नर (ट्रान्सजेंडर) समाज की महिलाओं को भी पूरे सम्मान के साथ शामिल किया जाता है, जो नारी शक्ति की एकजुटता को दर्शाता है।
मां दुर्गा की विदाई और पूजन के दौरान ढाक (ढोल) की थाप पर 'धुनुची नृत्य' किया जाता है। मिट्टी के बने एक विशेष पात्र (जिसे धुनुची कहते हैं) में नारियल की सूखी भूसी (छिलका), कपूर और गूगल-धूप जलाकर धुआं किया जाता है।
भक्तजन इस जलते हुए धुनुची पात्र को हाथों (और कभी-कभी दांतों या सिर पर रखकर) में लेकर मां दुर्गा की मूर्ति के समक्ष थिरकते हैं। मान्यता है कि धुनुची की सुगंधित धुंध और इस समर्पण नृत्य से वातावरण की सभी नकारात्मक ऊर्जाएं समाप्त होती हैं और मां दुर्गा अत्यंत प्रसन्न होती हैं।
'सिंदूर खेला' और 'धुनुची नृत्य' के पश्चात् अश्रुपूरित नेत्रों और 'आशे बोछोर आबार होबे' (अगले साल मां फिर आएंगी) के जयकारों के साथ मां दुर्गा की मूर्तियों का पवित्र नदियों और जलाशयों में विसर्जन किया जाता है। यह पर्व केवल एक धार्मिक विधि नहीं, बल्कि मातृशक्ति के सम्मान और उत्सव का सबसे सुंदर प्रतीक है।