
रामकृष्ण मुले, नईदुनिया, इंदौर : अहिल्या की नगरी इंदौर के हृदयस्थल राजवाड़ा स्थित प्राचीन महालक्ष्मी मंदिर में दीपावली पर आस्था और परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिलता हैं। यहां 193 वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार भक्त पीले चावल देकर माता महालक्ष्मी को अपने घर आने का आमंत्रण देते हैं।
मान्यता हैं कि माता को आमंत्रित करने से घर में वर्षभर सुख-समृद्धि और बरकत बनी रहती हैं। इस परंपरा का निर्वहन करने के लिए दीपावली पर देश-विदेश से 50 हजार से अधिक श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं। सुबह से देर शाम तक महिला और पुरुषों की करीब एक-एक किलोमीटर लंबी कतारें लगी रहती हैं।
मंदिर में माता को पीले चावल अर्पित करने के बाद भक्त इन्हें प्रसाद स्वरूप अपने घर ले जाते हैं। घर पहुंचने पर श्रद्धालु कुमकुम से माता के पदचिह्न बनाकर उनके आगमन का भाव व्यक्त करते हैं और इन पदचिह्नों के माध्यम से माता को घर के पूजन स्थल तक ले जाते हैं। इसके बाद शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से पूजन किया जाता हैं। कई भक्त माता को अर्पित चावल बरकत के प्रतीक के रूप में अपनी तिजोरी और दुकानों के गल्ले में भी रखते हैं।
दीपावली पर माता को आमंत्रित करने के लिए हर साल मंदिर में 50 क्विंटल से अधिक चावल एकत्रित होते हैं। इनमें से श्रद्धालुओं को बरकत के प्रतीक स्वरूप चावल वितरित किए जाते हैं। शेष चावल जरूरतमंदों को बांट दिए जाते हैं। इस तरह आस्था की यह परंपरा सेवा और सहयोग का संदेश भी देती हैं।
मंदिर में माता की सेवा कर रहे परिवार की पांचवीं पीढ़ी के पुजारी भानुप्रकाश दुबे बताते हैं कि मंदिर में माता महालक्ष्मी की 21 इंच की प्राचीन प्रतिमा प्रतिष्ठित हैं। साथ ही भगवान गणेश और रिद्धि-सिद्धि की काले पत्थर से निर्मित प्रतिमाएं भी विराजित हैं। नवरात्र से दीपावली तक करीब एक माह के दौरान माता का तीन बार विशेष शृंगार किया जाता हैं। दीपावली पर मंदिर में आकर्षक फूल बंगला सजाया जाता हैं और माता को छप्पन भोग अर्पित किया जाता हैं।
इंदौर से बाहर देश के विभिन्न शहरों और विदेशों में बसे भक्त भी माता से जुड़े रहते हैं। हर दिन आठ से दस श्रद्धालु वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से माता के दर्शन करते हैं। इनमें अमेरिका, दुबई, सिंगापुर और दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले इंदौरवासी भी शामिल हैं। दीपावली पर बाहर से आने वाले सैकड़ों श्रद्धालु मंदिर में दर्शन करने पहुंचते हैं।
महालक्ष्मी मंदिर का इतिहास होलकर रियासत से जुड़ा हैं। वर्ष 1833 में राजा हरिराव होलकर ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। उस समय मंदिर तीन मंजिला था, लेकिन आग लगने से यह क्षतिग्रस्त हो गया। वर्ष 1942 में इसका पुनः जीर्णोद्धार कराया गया। होलकर रियासत के दफ्तर में प्रवेश करने से पहले अधिकारी और कर्मचारी भी मंदिर में माता के दर्शन अवश्य करते थे।
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