
धर्म डेस्क। छठ पूजा में जितना महत्व सूर्य को अर्घ्य देने और व्रत रखने का है, उतनी ही खास जगह पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की भी है। घाटों पर जब व्रती बांस के सूप और दउरा में फल, ठेकुआ, नारियल और दूसरी पूजन सामग्री लेकर पहुंचते हैं, तो यह नजारा छठ की पहचान बन जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पूजा में बांस के सूप और दउरा का ही इस्तेमाल क्यों किया जाता है? इसके पीछे सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति और ग्रामीण जीवन से जुड़ा रिश्ता भी है।
छठ पूजा में बांस से बने सूप और दउरा का इस्तेमाल पीढ़ियों से होता आ रहा है। सूप में पूजा की सामग्री सजाकर सूर्य देव को अर्घ्य देने के लिए ले जाया जाता है, जबकि दउरा में फल, प्रसाद और दूसरे सामान रखे जाते हैं। कई परिवारों में इन्हें पूजा के लिए शुभ और पवित्र माना जाता है।
लोकमान्यता के अनुसार, बांस की बनी वस्तुएं पूजा में प्राकृतिक और शुद्ध सामग्री के रूप में इस्तेमाल की जाती हैं। हालांकि, छठ पूजा की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में बांस के सूप और दउरा के इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग मान्यताएं भी मिलती हैं। इसे किसी एक शास्त्रीय नियम के बजाय लोकपरंपरा के रूप में समझना ज्यादा सही है।
बांस भारत के कई ग्रामीण इलाकों में रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा रहा है। इससे टोकरी, चटाई, सूप, दउरा और घरेलू इस्तेमाल की कई चीजें बनाई जाती हैं। यह हल्का होता है, आसानी से उपलब्ध रहता है और कुशल कारीगर इससे अलग-अलग आकार की वस्तुएं तैयार कर सकते हैं।
छठ पूजा में बांस के सूप और दउरा का इस्तेमाल इस पारंपरिक हुनर को भी आगे बढ़ाता है। त्योहार के समय इनकी मांग बढ़ने से बांस के सामान बनाने वाले कारीगरों और स्थानीय बाजारों को भी काम मिलता है।
छठ पूजा प्रकृति के प्रति आभार जताने का पर्व भी मानी जाती है। इसमें सूर्य, जल और धरती से मिलने वाले फल-अनाज को पूजा में शामिल किया जाता है। ऐसे में बांस से बने सूप और दउरा का इस्तेमाल इस प्रकृति-केंद्रित परंपरा के साथ मेल खाता है।
यही वजह है कि आधुनिक दौर में भी प्लास्टिक या दूसरी कृत्रिम चीजों के बजाय कई परिवार छठ पूजा में पारंपरिक बांस के सूप और दउरा को प्राथमिकता देते हैं। इनके जरिए पूजा की परंपरा के साथ स्थानीय कारीगरों और उनके हुनर को भी सम्मान मिलता है।
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