
धर्म डेस्क। दुर्गा पूजा और महानवमी (19 अक्टूबर 2026) के पावन अवसर पर पश्चिम बंगाल तथा पूरे देश के पूजा पंडालों में मां दुर्गा के अलौकिक और भव्य स्वरूप के दर्शन हो रहे हैं। कोलकाता का प्रसिद्ध 'कुम्हारटोली' (Kumartuli) क्षेत्र पीढ़ियों से मिट्टी की मूर्तियों के निर्माण के लिए दुनिया भर में विख्यात है।
मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण केवल माटी को आकार देना नहीं है, बल्कि इसके पीछे सदियों पुरानी सामाजिक समरसता, धार्मिक मान्यताओं, गंगा की मिट्टी और ऐतिहासिक डाक व्यवस्था से जुड़ी दिलचस्प कथाएं समाहित हैं।
आइए समझते हैं मां दुर्गा की प्रतिमा निर्माण से जुड़ी 4 प्रमुख पारंपरिक मान्यताएं-
दुर्गा प्रतिमा निर्माण की सबसे चर्चित और पवित्र परंपराओं में से एक है- रेड लाइट एरिया (जैसे कोलकाता का सोनागाछी) के घर की चौखट से मिट्टी लाना, जिसे बंगाल में 'पुण्य माटी' कहा जाता है। इसे प्रतिमा बनाने वाली मुख्य मिट्टी में मिलाया जाता है।
इसके पीछे दो प्रमुख सामाजिक और धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं-
धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब कोई व्यक्ति वेश्यालय में प्रवेश करता है, तो वह अपने सभी पुण्य, पवित्रता और अच्छाइयां उस घर की चौखट पर ही छोड़कर अंदर जाता है। इस लोकविश्वास के कारण उस चौखट की मिट्टी को सर्वाधिक 'पुण्य माटी' माना जाता है।
सामाजिक दृष्टिकोण से, जिस वर्ग या महिलाओं को समाज में अक्सर तिरस्कार और भेदभाव झेलना पड़ता है, मां दुर्गा की पूजा में उनके घर की माटी को शामिल करके यह संदेश दिया जाता है कि आदिशक्ति के दरबार में कोई भी अछूत या छोटा-बड़ा नहीं है। यह परंपरा समाज में समानता और स्वीकार्यता का प्रतीक है।
दुर्गा प्रतिमा निर्माण का कार्य आषाढ़ माह में 'रथयात्रा' के दिन 'पाटा पूजा' (लकड़ी के मुख्य ढांचे के पूजन) से शुरू होता है। लकड़ी और बांस के ढांचे पर पुआल (पुआल) बांधकर आकार दिया जाता है। इसके बाद गंगा-हुगली नदी क्षेत्र की खास चिकनी मिट्टी की परतें चढ़ाई जाती हैं।
प्रतिमा सूखने और रंग-रोगन के बाद महालया या षष्ठी की तिथि पर मूर्तिकार मां दुर्गा की आंखें बनाते हैं, जिसे 'चोख्खुदान' कहा जाता है। यह प्रतीकात्मक रूप से प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा/चेतना जागृत करने की प्रक्रिया मानी जाती है।
दुर्गा प्रतिमाओं के पारंपरिक और शाही शृंगार में 'डाकेर साज' शैली का विशेष स्थान है। पुराने समय में मां दुर्गा की प्रतिमाओं को सजाने के लिए चांदी के वर्क, जरी, सुनहरी चमकीली सामग्रियां और मोतियों का सामान जर्मनी और विदेश से डाक (Post / Postal Service) के जरिए मंगाया जाता था। 'डाक' से सामान आने के कारण इस सजावट शैली का नाम 'डाकेर साज' पड़ा।
इसके अलावा, शोला (एक विशेष मुलायम जलीय वनस्पति) से बनी सफेद रंग की बेहद बारीक मुकुट और मालाओं ('शोलापिथ') से भी देवी मां का शृंगार किया जाता है।
पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह मूर्तिकारों की पीढ़ियों पुरानी शिल्पकला, सामाजिक बंधनों को तोड़ने वाली परंपराओं और अटूट लोक-आस्था का महासंगम है। यही कारण है कि यूनेस्को (UNESCO) ने कोलकाता की दुर्गा पूजा को 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' का दर्जा दिया है।
यह भी पढ़ें- 20 या 21 अक्टूबर... कब है दशहरा? दूर हुआ तारीखों का भ्रम! जानिए अपने शहर में कब होगा रावण दहन