
धर्म डेस्क। सनातन परंपरा में दीपावली का महापर्व केवल दीपों की रोशनी, वैभव और खुशियों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह धन, विवेक, सद्बुद्धि और जीवन में संतुलन का सबसे बड़ा प्रतीक है। दीवाली की रात्रि धन-ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी माता लक्ष्मी का पूजन किया जाता है, परंतु हर पूजा विधान में उनके साथ प्रथम पूज्य श्री गणेश जी की उपस्थिति अनिवार्य होती है।
भगवान श्री गणेश और माता लक्ष्मी की एक साथ पूजा के पीछे केवल धार्मिक विधि नहीं, बल्कि एक अत्यंत भावुक पौराणिक कथा और गहरा जीवन दर्शन छिपा हुआ है।
आइए जानते हैं दीवाली पर गणेश-लक्ष्मी पूजन का पौराणिक एवं दार्शनिक रहस्य:
महापुराणों में वर्णित पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय धन की देवी माता लक्ष्मी को अपने अपरंपार वैभव और महिमा पर सूक्ष्म अभिमान हो गया था। उन्हें लगने लगा था कि यह संपूर्ण संसार केवल उनकी कृपा और धन पर ही निर्भर है।
जब भगवान श्री हरि विष्णु ने माता लक्ष्मी का यह अहंकार देखा, तो उन्होंने अत्यंत प्रेमपूर्वक उन्हें समझाया- हे देवी! भले ही आपके पास समस्त जग का धन, वैभव और सम्मान है, परंतु एक स्त्री का जीवन संतान सुख के बिना अधूरा माना जाता है। आप अभी तक अपुत्रा हैं, इसलिए आपकी पूर्णता नहीं हुई है।
यह सुनते ही माता लक्ष्मी का अभिमान टूट गया और वे अत्यंत दुःखी हो गईं। अपने इस मानसिक संताप को लेकर वे जगतजननी माता पार्वती के पास पहुंचीं। माता पार्वती ने लक्ष्मी जी की व्यथा को समझा और अपने छोटे पुत्र श्री गणेश को गोद में देते हुए कहा- हे लक्ष्मी! आज से गणेश तुम्हारा दत्तक पुत्र होगा।
माता पार्वती के इस वात्सल्य से लक्ष्मी जी अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने गणेश जी को दुलारते हुए वरदान दिया- आज से जहां भी मेरी पूजा होगी, वहां मेरे पुत्र गणेश की पूजा मुझसे पूर्व की जाएगी। जो मनुष्य बिना गणेश के मेरी पूजा करेगा, उसे मेरी कृपा प्राप्त नहीं होगी।
इसी पौराणिक वरदान के कारण हर शुभ अवसर और विशेष रूप से दीपावली पर माता लक्ष्मी से पहले श्री गणेश का आह्वान और पूजन किया जाता है।
पौराणिक कथा के इतर, इस पूजन परंपरा का आध्यात्मिक और व्यावहारिक संदेश भी अत्यंत गूढ़ है-
दीपावली की पावन रात पहले भगवान गणेश की पूजा इसलिए की जाती है ताकि वे साधक को विवेक, सही निर्णय क्षमता और सद्बुद्धि प्रदान करें। तत्पश्चात माता लक्ष्मी की आराधना की जाती है, जिससे प्राप्त धन और समृद्धि घर में सदा के लिए स्थायी रूप से वास करे और उसका उपयोग समाज और परिवार के कल्याण में हो सके।