
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर । जबलपुर को खेलधानी कहा जाता है, लेकिन हाॅकी की राष्ट्रीय पिच पर इस पहचान को मजबूती से दर्ज होने में करीब चार दशक लग गए। एक गोलकीपर और दूसरा मिडफील्डर, दोनों की कहानी चमकदार मैदान से नहीं, बल्कि अभावों से शुरू होती है।
टीम इंडिया की पूर्व कप्तान और अर्जुन अवार्डी स्ट्राइकर मधु यादव के बाद अब आयुष रजक और सिद्धार्थ ने जूनियर हाॅकी में राष्ट्रीय पहचान बनाकर शहर की उम्मीदों को फिर जगा दिया है।
आयुष की मां दूसरों के घरों में काम करती थीं और परिवार किराए के छोटे से मकान में रहता था। वहीं सिद्धार्थ के पिता लेखराम साइकिल रिक्शा चलाकर परिवार चलाते रहे। मां का निधन तब हो गया था जब सिद्धार्थ छोटा था। आर्थिक तंगी के बावजूद दोनों ने हाॅकी की स्टिक नहीं छोड़ी।
इन सफलताओं के बीच जबलपुर की खेल व्यवस्था का बड़ा सवाल भी सामने है। लाखों की आबादी वाले जिले के पास महज एक एस्ट्रोटर्फ है और वह भी अपनी उम्र पूरी कर चुका है। प्रतिभा मौजूद है, संघर्ष करने वाले खिलाड़ी मौजूद हैं, लेकिन उन्हें सुविधाओं की दरकार है। राष्ट्रीय खेल दिवस पर यह कहानी उपलब्धि के साथ उस सिस्टम का आईना भी है, जिसे अगली मधु, आयुष और सिद्धार्थ की तलाश है।
आयुष रजक और सिद्धार्थ ने भारतीय हाॅकी टीम की अंडर 18 टीम में अपनी जगह बनाई है। यह दोनों ही भारत की ओर से जापान में मैच खेले। दोनों ही बेहद गरीब स्थिति के हैं, आयुष रजक की मां दूसरों के घरों में काम करती है। यह परिवार किराए के घर में रहता है, लेकिन इसके बावजूद आयुष ने अपनी मेहनत के दम पर हाॅकी टीम में जगह बनाई है। इसी तरह सिद्धार्थ के पिता रिक्शा चलाकर बेटे को इंटरनेशनल खिलाड़ी बनाया।
सदर आयुष की मां ममता रजक पति अनिल रजक के 2025 में निधन होने बाद विभिन्न घरों में कार्य किया और बेटे को एक श्रेष्ठ खिलाड़ी बनाया। आयुष की मां ममता रजक ने बताया, उनका बेटा अभी मात्र 17 साल का है। हमने उसका एडमिशन कैंट बोर्ड के सरकारी स्कूल कटंगा में करवाया था। यहीं पर आयुष रजक ने हाॅकी खेलना शुरू किया था।
वह हरकी खेलने में काफी अच्छा था, तो उसके कोच ने कहा कि तुम्हें यदि आगे अपना करियर हाॅकी में बनाना है तो रानीताल के टर्फ मैदान में जाकर प्रैक्टिस करनी चाहिए। आयुष के लिए ट्रफ में जाना कोई सरल काम नहीं था। सदर में उनके घर से रानीताल लगभग 8 किलोमीटर की दूरी आयुष कभी अपने दोस्तों के साथ लिफ्ट लेकर जाता था तो कभी पैदल, बाद में जब उसका रुझान बहुत अधिक हाॅकी की तरफ हुआ तो हमने उसे साइकिल मां ने दिलाई।
सिद्धार्थ के पिता लेखराम जबलपुर में हाथ रिक्शा चलाकर किसी तरह परिवार का पेट पालते हैं। सिद्धार्थ की मां का साया बचपन में ही सिर से उठ गया था। लेखराम ने बताया कि जब सिद्धार्थ मात्र 10 वर्ष का था, तभी उसका चयन हाॅकी अकादमी में हो गया था। भीषण आर्थिक तंगी के बावजूद उसने कभी हिम्मत नहीं हारी।
खराब मौसम या स्वास्थ्य खराब सिद्धार्थ ने कभी अभ्यास नहीं छोड़ा। इसी लगन के दम पर उसे टूर्नामेंट में एक मुकाबले के दौरान 'मैन ऑफ द मैच' का पुरस्कार भी मिला। अब परिवार को उम्मीद है कि इस बड़ी सफलता के बाद सिद्धार्थ को एक अच्छी नौकरी मिलेगी, जिससे उनकी गरीबी दूर हो सकेगी।