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राष्ट्रीय खेल दिवस 2026 : चार दशक के बाद हाॅकी में लौटी जबलपुर की चमक, अभावों से शुरू हुआ सफर

खराब मौसम या स्वास्थ्य खराब सिद्धार्थ ने कभी अभ्यास नहीं छोड़ा। इसी लगन के दम पर उसे टूर्नामेंट में एक मुकाबले के दौरान 'मैन ऑफ द मैच' का पुरस्कार भी ...और पढ़ें

By Alok BanerjeeEdited By: Dheeraj kumar Bajpai
Publish Date: Fri, 28 Aug 2026 07:22:15 PM (IST)Updated Date: Fri, 28 Aug 2026 07:22:15 PM (IST)
राष्ट्रीय खेल दिवस 2026 : चार दशक के बाद हाॅकी में लौटी जबलपुर की चमक, अभावों से शुरू हुआ सफर
जबलपुर से निकले दो इंटरनेशनल हाॅकी खिलाड़ी आयुष व सिद्धार्थ। फाइल

HighLights

  1. अर्जुन अवार्डी मधु यादव के बाद आयुष-सिद्धार्थ ने बनाई राष्ट्रीय पहचान
  2. लाखों की आबादी वाले जिले में एकमात्र एस्ट्रोटर्फ भी उम्र पूरी कर चुका
  3. आर्थिक तंगी होने के बावजूद भी दोनों ने हाॅकी की स्टिक नहीं छोड़ी

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर । जबलपुर को खेलधानी कहा जाता है, लेकिन हाॅकी की राष्ट्रीय पिच पर इस पहचान को मजबूती से दर्ज होने में करीब चार दशक लग गए। एक गोलकीपर और दूसरा मिडफील्डर, दोनों की कहानी चमकदार मैदान से नहीं, बल्कि अभावों से शुरू होती है।

टीम इंडिया की पूर्व कप्तान और अर्जुन अवार्डी स्ट्राइकर मधु यादव के बाद अब आयुष रजक और सिद्धार्थ ने जूनियर हाॅकी में राष्ट्रीय पहचान बनाकर शहर की उम्मीदों को फिर जगा दिया है।

तंगी के बावजूद दोनों ने हाकी की स्टिक नहीं छोड़ी

आयुष की मां दूसरों के घरों में काम करती थीं और परिवार किराए के छोटे से मकान में रहता था। वहीं सिद्धार्थ के पिता लेखराम साइकिल रिक्शा चलाकर परिवार चलाते रहे। मां का निधन तब हो गया था जब सिद्धार्थ छोटा था। आर्थिक तंगी के बावजूद दोनों ने हाॅकी की स्टिक नहीं छोड़ी।


जबलपुर की खेल व्यवस्था का बड़ा सवाल

इन सफलताओं के बीच जबलपुर की खेल व्यवस्था का बड़ा सवाल भी सामने है। लाखों की आबादी वाले जिले के पास महज एक एस्ट्रोटर्फ है और वह भी अपनी उम्र पूरी कर चुका है। प्रतिभा मौजूद है, संघर्ष करने वाले खिलाड़ी मौजूद हैं, लेकिन उन्हें सुविधाओं की दरकार है। राष्ट्रीय खेल दिवस पर यह कहानी उपलब्धि के साथ उस सिस्टम का आईना भी है, जिसे अगली मधु, आयुष और सिद्धार्थ की तलाश है।

मां ने घरों में काम किया, पिता ने रिक्शा चलाया

आयुष रजक और सिद्धार्थ ने भारतीय हाॅकी टीम की अंडर 18 टीम में अपनी जगह बनाई है। यह दोनों ही भारत की ओर से जापान में मैच खेले। दोनों ही बेहद गरीब स्थिति के हैं, आयुष रजक की मां दूसरों के घरों में काम करती है। यह परिवार किराए के घर में रहता है, लेकिन इसके बावजूद आयुष ने अपनी मेहनत के दम पर हाॅकी टीम में जगह बनाई है। इसी तरह सिद्धार्थ के पिता रिक्शा चलाकर बेटे को इंटरनेशनल खिलाड़ी बनाया।

पैदल मैदान जाता था आयुष

सदर आयुष की मां ममता रजक पति अनिल रजक के 2025 में निधन होने बाद विभिन्न घरों में कार्य किया और बेटे को एक श्रेष्ठ खिलाड़ी बनाया। आयुष की मां ममता रजक ने बताया, उनका बेटा अभी मात्र 17 साल का है। हमने उसका एडमिशन कैंट बोर्ड के सरकारी स्कूल कटंगा में करवाया था। यहीं पर आयुष रजक ने हाॅकी खेलना शुरू किया था।

आयुष के लिए ट्रफ में जाना कोई सरल काम नहीं था

वह हरकी खेलने में काफी अच्छा था, तो उसके कोच ने कहा कि तुम्हें यदि आगे अपना करियर हाॅकी में बनाना है तो रानीताल के टर्फ मैदान में जाकर प्रैक्टिस करनी चाहिए। आयुष के लिए ट्रफ में जाना कोई सरल काम नहीं था। सदर में उनके घर से रानीताल लगभग 8 किलोमीटर की दूरी आयुष कभी अपने दोस्तों के साथ लिफ्ट लेकर जाता था तो कभी पैदल, बाद में जब उसका रुझान बहुत अधिक हाॅकी की तरफ हुआ तो हमने उसे साइकिल मां ने दिलाई।

सिद्धार्थ को नौकरी की आस, तभी दूर होगी गरीबी

सिद्धार्थ के पिता लेखराम जबलपुर में हाथ रिक्शा चलाकर किसी तरह परिवार का पेट पालते हैं। सिद्धार्थ की मां का साया बचपन में ही सिर से उठ गया था। लेखराम ने बताया कि जब सिद्धार्थ मात्र 10 वर्ष का था, तभी उसका चयन हाॅकी अकादमी में हो गया था। भीषण आर्थिक तंगी के बावजूद उसने कभी हिम्मत नहीं हारी।

खराब मौसम या स्वास्थ्य खराब, फिर भी अभ्यास

खराब मौसम या स्वास्थ्य खराब सिद्धार्थ ने कभी अभ्यास नहीं छोड़ा। इसी लगन के दम पर उसे टूर्नामेंट में एक मुकाबले के दौरान 'मैन ऑफ द मैच' का पुरस्कार भी मिला। अब परिवार को उम्मीद है कि इस बड़ी सफलता के बाद सिद्धार्थ को एक अच्छी नौकरी मिलेगी, जिससे उनकी गरीबी दूर हो सकेगी।

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