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Trump के आगे नहीं झुकेगा पाक! Abraham Accords पर हस्ताक्षर करने से इनकार, बदलना पड़ सकता है अपना पासपोर्ट

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान शांति समझौते के तहत इस्लामी देशों पर इजरायल के साथ संबंध सुधारने और Abraham Accords पर हस्ताक्षर करने ...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: ADITYA KUMAR
Publish Date: Wed, 27 May 2026 03:23:03 PM (IST)Updated Date: Wed, 27 May 2026 03:23:03 PM (IST)
Trump के आगे नहीं झुकेगा पाक! Abraham Accords पर हस्ताक्षर करने से इनकार, बदलना पड़ सकता है अपना पासपोर्ट
पाकिस्तान ने Abraham Accords पर हस्ताक्षर करने से इनकार

HighLights

  1. ट्रंप ने ईरान शांति समझौते के लिए अब्राहम केंट पर साइन अनिवार्य किया
  2. पाक रक्षा मंत्री बोले- इजरायल को मानना हमारी विचारधारा के खिलाफ
  3. समझौता स्वीकार करने पर पाकिस्तान को बदलना पड़ता अपना पासपोर्ट क्लॉज

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। संयुक्त राज्य अमेरिका (US) के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान शांति समझौते के तहत इस्लामी देशों पर इजरायल के साथ संबंध सुधारने और 'अब्राहम डिक्लरेशन' (Abraham Accords) पर हस्ताक्षर करने के दबाव को पाकिस्तान ने सिरे से खारिज कर दिया है। पाकिस्तान ने अपने करीबी दोस्त अमेरिका के इस प्रस्ताव पर 'ना' कहकर एक दुर्लभ रुख अपनाया है। यदि पाकिस्तान इस समझौते के लिए तैयार होता, तो उसे अपनी दशकों पुरानी विदेश नीति के साथ-साथ अपने पासपोर्ट में भी बड़ा बदलाव करना पड़ता।

वर्तमान में अमेरिका और इजरायल के संबंध बेहद मजबूत दिख रहे हैं, जहां राष्ट्रपति ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू साझा लक्ष्यों पर काम कर रहे हैं। हाल ही में मध्य पूर्व (Middle East) में भड़के संघर्ष को समाप्त करने के प्रयास के तहत - जो कथित तौर पर इजरायल-अमेरिका के ईरान पर हमलों के बाद शुरू हुआ था - ट्रंप पाकिस्तान की मध्यस्थता में ईरान के साथ एक शांति समझौता कराने की कोशिश कर रहे हैं। इसी सिलसिले में ट्रंप ने अपने एक सोशल मीडिया पोस्ट में सऊदी अरब, कतर, पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र और जॉर्डन जैसे देशों का नाम लेते हुए कहा था कि ईरान के साथ समझौता होने के बाद इन सभी देशों के लिए 'अब्राहम डिक्लरेशन' पर हस्ताक्षर करना 'अनिवार्य' (Mandatory) होना चाहिए।


क्या है अब्राहम डिक्लरेशन (Abraham Accords)?

अब्राहम डिक्लरेशन का मुख्य उद्देश्य इजरायल और उसके पड़ोसी इस्लामी देशों के बीच राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को सामान्य बनाना है। सरल शब्दों में कहें तो इसके तहत इस्लामी देशों द्वारा इजरायल को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता दी जानी है।

  • शुरुआती हस्ताक्षरकर्ता: डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल (2017-2021) के दौरान संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन और मोरक्को ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। सूडान भी इसमें शामिल है, हालांकि वहां अभी औपचारिक संबंध पूरी तरह स्थापित होने बाकी हैं।

  • विस्तार: वर्तमान ट्रंप प्रशासन इसका दायरा बढ़ाने में जुटा है। पिछले साल नवंबर में गैर-अरब देश कजाकिस्तान भी इस समूह में शामिल होने के लिए सहमत हुआ था।
  • इस डिक्लरेशन के मुख्य सिद्धांतों में मध्य पूर्व में शांति, सह-अस्तित्व, धार्मिक स्वतंत्रता, आपसी सम्मान और संवाद के जरिए कट्टरपंथ व संघर्षों को समाप्त करना शामिल है।
  • समझौते पर झुके तो क्यों बदलना पड़ेगा पाकिस्तान का पासपोर्ट?

    यदि इस्लामाबाद भविष्य में 'अब्राहम डिक्लरेशन' का हिस्सा बनने और इजरायल को मान्यता देने के लिए तैयार होता है, तो उसे अपनी विदेश नीति के सबसे बड़े प्रतीक यानी अपने पासपोर्ट को बदलना होगा।

    दरअसल, पाकिस्तानी पासपोर्ट पर स्पष्ट रूप से एक क्लॉज (शर्त) लिखा होता है: "यह पासपोर्ट इजरायल को छोड़कर दुनिया के सभी देशों के लिए वैध है।" यह क्लॉज इजरायल को मान्यता न देने के पाकिस्तान के दशकों पुराने रुख को दर्शाता है। अगर पाकिस्तान इजरायल के साथ संबंध सामान्य करता है, तो उसे कानूनी तौर पर अपने पासपोर्ट से इस पाबंदी को हटाना पड़ेगा, जो कि देश के लिए एक बहुत बड़ा वैचारिक और राजनयिक बदलाव होगा।

    "यह हमारी बुनियादी विचारधारा के खिलाफ" - पाकिस्तानी रक्षा मंत्री

    पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ ने अमेरिकी राष्ट्रपति के इस 'अनिवार्य अनुरोध' पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि अब्राहम डिक्लरेशन में शामिल होना इस्लामाबाद की "बुनियादी विचारधारा" के खिलाफ है।

    आसिफ ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान का स्टैंड हमेशा से बेहद साफ रहा है। जब तक 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर और पूर्वी यरुशलम (अल-कुद्स अल-शरीफ) को राजधानी मानकर एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना नहीं हो जाती, तब तक इजरायल को स्वीकार करने का सवाल ही नहीं उठता। विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा, "आप उन लोगों के साथ कैसे बैठ सकते हैं जिनके शब्दों पर एक दिन भी भरोसा नहीं किया जा सकता?" ख्वाजा आसिफ इजरायल के कड़े आलोचक रहे हैं और उन्होंने इजरायल को 'मानवता के लिए अभिशाप' तक कहा है।

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