
डिजिटल डेस्क। पाकिस्तान में गहराते आर्थिक संकट के बीच बढ़ती बेरोजगारी ने वहां के युवाओं का भविष्य अंधकार में डाल दिया है। सरकारी आंकड़ों में बेरोजगारी दर को महज 7 प्रतिशत बताया जा रहा है, लेकिन जाने-माने अर्थशास्त्री डॉ. हाफिज पाशा के अनुसार, वास्तविक स्थिति इससे कहीं अधिक भयावह है और यह दर 22 प्रतिशत के करीब पहुंच चुकी है।
मानव क्षमता की भारी बर्बादी कराची के 'बिजनेस रिकॉर्डर' में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, पाकिस्तान में लगभग 80 से 90 लाख युवा पूरी तरह बेरोजगार हैं। वहीं, करीब डेढ़ से दो करोड़ लोग ऐसे अनौपचारिक और छोटे-मोटे कार्यों में लगे हैं, जहां उनकी आय और भविष्य दोनों अनिश्चित हैं। हर साल 22 लाख से ज्यादा नए युवा श्रम बल में शामिल हो रहे हैं, लेकिन देश की ढाई से साढ़े तीन प्रतिशत की धीमी जीडीपी वृद्धि दर इनमें से आधे युवाओं को भी रोजगार देने में सक्षम नहीं है।
शिक्षा और कौशल का अभाव रिपोर्ट में बेरोजगारी के इस संकट के लिए दोषपूर्ण नीतिगत निर्णयों को जिम्मेदार ठहराया गया है। पाकिस्तान के विश्वविद्यालय ऐसी डिग्रियां बांट रहे हैं, जिनकी बाजार में मांग नहीं है। दूसरी ओर, तकनीकी और व्यावसायिक संस्थानों को पर्याप्त फंड नहीं मिल रहा है, जिससे शिक्षित युवा भी कौशल के अभाव में बेरोजगार भटक रहे हैं।
यह स्थिति किसी आकस्मिक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों की नीतिगत विफलता और मानव संसाधन की अनदेखी का नतीजा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार ने इस "मानव क्षमता की बर्बादी" को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह संकट देश की स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।