
डिजिटल डेस्क। सत्ता का महा-पलटवार शनिवार की उस सुबह ने लैटिन अमेरिका के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया, जब राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा की कि निकोलस मादुरो का युग समाप्त हो चुका है। अमेरिकी सैन्य कार्रवाई (US Strikes Venezuela) ने न केवल मादुरो को सत्ता से बेदखल किया, बल्कि वेनेजुएला की कमान अब सीधे 'व्हाइट हाउस' के हाथों में है। लेकिन यह केवल एक राजनीतिक तख्तापलट नहीं है, यह दुनिया के 303 अरब बैरल कच्चे तेल पर नियंत्रण की जंग है।

दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक देश भारत के लिए यह खबर किसी 'लॉटरी' से कम नहीं है, लेकिन इसके साथ कुछ पेंच भी फंसे हैं.
सस्ते तेल का नया ठिकाना: भारत अपनी जरूरत का 85% तेल आयात करता है। वेनेजुएला का तेल हमेशा से सस्ता रहा है। यदि अमेरिकी कंपनियां वहां उत्पादन शुरू करती हैं, तो भारत को खाड़ी देशों (OPEC) पर अपनी निर्भरता कम करने का एक बेहतरीन विकल्प मिलेगा।
रिफाइनरियों की चांदी: भारत की रिलायंस और नयरा जैसी रिफाइनरियां वेनेजुएला के 'भारी कच्चे तेल' (Heavy Crude) को प्रोसेस करने के लिए विशेष रूप से डिजाइन की गई हैं। वहां से सप्लाई शुरू होते ही भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें जमीन पर आ सकती हैं।
रूस-ईरान का विकल्प: वर्तमान में भारत रूस से सस्ता तेल ले रहा है। वेनेजुएला के बाजार में आने से भारत के पास मोलभाव (Bargaining power) करने की ताकत बढ़ जाएगी।
-1767522762406.jpg)
ट्रंप की इस चाल ने वैश्विक तेल बाजार की चूलें हिला दी हैं...
पेट्रोल-डीजल की कीमतों में गिरावट: ट्रंप का लक्ष्य वेनेजुएला के माध्यम से बाजार में तेल की बाढ़ लाना है। यदि उत्पादन 1 मिलियन बैरल से बढ़कर अपने पुराने स्तर पर पहुंचता है, तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें $50-$60 प्रति बैरल तक गिर सकती हैं।
ओपेक (OPEC) की बादशाहत को खतरा: अब तक सऊदी अरब और रूस मिलकर तेल की कीमतें तय करते थे। वेनेजुएला पर अमेरिकी नियंत्रण के बाद, अमेरिका खुद 'ग्लोबल ऑयल डिक्टेटर' बन सकता है।
बुनियादी ढांचे का पुनर्जन्म: 50 साल पुरानी पाइपलाइनों और जर्जर ढांचे को सुधारने के लिए अमेरिका 58 अरब डॉलर झोंकने को तैयार है। यह इतिहास का सबसे बड़ा 'एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर' प्रोजेक्ट साबित होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, वेनेजुएला का तेल अमेरिका के लिए 'घर की खेती' जैसा है। दूरी कम होने के कारण परिवहन का खर्च बचेगा और अमेरिकी रिफाइनरियां जो वेनेजुएला के तेल के लिए ही बनी थीं, वे अब अपनी अधिकतम क्षमता पर काम कर सकेंगी। ट्रंप ने साफ कर दिया है कि उनकी दिग्गज तेल कंपनियां वहां निवेश करेंगी, जिसका सीधा मतलब है - अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अरबों डॉलर का मुनाफा।
-1767522739583.jpg)
भले ही ट्रंप ने नियंत्रण कर लिया हो, लेकिन फिल फ्लिन जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि मादुरो और चावेज ने व्यवस्था को इतना बर्बाद कर दिया है कि उसे पटरी पर लाने में सालों लगेंगे। 58 अरब डॉलर का निवेश और दशकों पुरानी जंग लगी पाइपलाइनों को बदलना रातों-रात संभव नहीं होगा।
वेनेजुएला की यह घटना वैश्विक तेल राजनीति का 'गेम-चेंजर' है। अगर ट्रंप की योजना सफल रही, तो आने वाले समय में दुनिया का पावर सेंटर खाड़ी देशों से हटकर अमेरिका के करीब आ जाएगा। भारत के लिए यह अपनी अर्थव्यवस्था को पंख लगाने का सुनहरा मौका है, बशर्ते वह अमेरिका के साथ अपने ऊर्जा समीकरणों को सही ढंग से बैठा पाए।
इसे भी पढ़ें... 'सावधान रहें और अपनी जान बचाएं...', वेनेजुएला के बाद ट्रंप की अब इस देश को सीधी धमकी, पड़ोसी देशों को दी सुधरने की चेतावनी