महाराष्ट्र का एक अनोखा बैंक... महिलाओं को लोन में मिलती है बकरी, देना पड़ता है मेमना, किसका है आइडिया?
आमतौर पर बैंक पैसे का लेन-देन करते हैं, लेकिन महाराष्ट्र के जलगांव जिले की चालीसगांव तहसील में एक ऐसा अनोखा बैंक है, जहां पैसे की जगह बकरियां चलती हैं ...और पढ़ें
Publish Date: Thu, 15 Jan 2026 02:55:36 PM (IST)Updated Date: Thu, 15 Jan 2026 02:55:35 PM (IST)
महाराष्ट्र का एक अनोखा बैंकHighLights
- महाराष्ट्र में पैसों के बजाय बकरी मिलता है लोन, मेमना होता है ब्याज
- सेवा सहयोग फाउंडेशन की पहल से 300 महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर
- पशुपालन से महिलाएं कमा रही हैं 30,000 सालाना, खुद की कंपनी भी शुरू
बिजनेस डेस्क। आमतौर पर बैंक पैसे का लेन-देन करते हैं, लेकिन महाराष्ट्र के जलगांव जिले की चालीसगांव तहसील में एक ऐसा अनोखा बैंक है, जहां पैसे की जगह बकरियां चलती हैं। 'गोट बैंक' (Goat Bank) के नाम से मशहूर यह मॉडल गरीब, विधवा और भूमिहीन महिलाओं के लिए वरदान साबित हो रहा है। यहां लोन के रूप में एक बकरी दी जाती है और उसकी अदायगी भी बकरी के बच्चे (मेमने) के रूप में ही होती है।
300 से अधिक महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर
इस बकरी बैंक का संचालन पुणे का 'सेवा सहयोग फाउंडेशन' करता है। इसका मुख्य उद्देश्य उन महिलाओं की आर्थिक मदद करना है, जिन्हें औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से लोन मिलने में कठिनाई होती है। अब तक इस मॉडल के माध्यम से 300 से अधिक महिलाएं आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। यह प्रोजेक्ट न केवल महिलाओं को रोजगार दे रहा है, बल्कि उन्हें समाज में एक नई पहचान भी दिला रहा है।
कैसे काम करता है यह मॉडल?
बैंक का कार्यप्रणाली काफी सरल और प्रभावी है। सबसे पहले महिलाओं को पशुपालन और बकरी पालन की उचित ट्रेनिंग दी जाती है। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद, हर महिला को एक गर्भवती बकरी प्रदान की जाती है। शर्त बस इतनी होती है कि छह से नौ महीने बाद जब बकरी बच्चे को जन्म दे और वह बड़ा हो जाए, तो महिला को एक बच्चा बैंक में वापस जमा करना पड़ता है। एक स्वस्थ बकरी साल में 3-4 बच्चे देती है, जिससे महिला एक बच्चा लौटाने के बाद बाकी को बेचकर 30,000 रुपए तक सालाना कमा सकती है।
उत्पादक कंपनी का गठन: बाजार तक सीधी पहुंच
इस प्रोजेक्ट की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इससे जुड़ी महिलाओं ने अब अपनी एक कंपनी 'गिरना परिसर महिला पशुपालक उत्पादक कंपनी' भी शुरू कर दी है। इसके जरिए वे सामूहिक रूप से बकरियों की बिक्री और बाजार प्रबंधन को नियंत्रित करती हैं। इस मॉडल की अपार सफलता को देखते हुए अब आयोजक इसे अन्य ग्रामीण क्षेत्रों में भी लागू करने की योजना बना रहे हैं।