बिजनेस डेस्क। देश में मौजूद सैकड़ों राष्ट्रीय राजमार्गों में NH-44 को सबसे अहम और सबसे लंबा हाईवे माना जाता है। यह सड़क भारत को उत्तर से दक्षिण तक जोड़ती है। इसकी शुरुआत जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर से होती है और यह तमिलनाडु के कन्याकुमारी तक जाती है। करीब 3,745 किलोमीटर लंबा यह हाईवे 11 से ज्यादा राज्यों से गुजरते हुए कई बड़े शहरों, धार्मिक स्थलों और औद्योगिक क्षेत्रों को आपस में जोड़ता है।
एक ही बार में नहीं बना NH-44
NH-44 को किसी एक परियोजना के तहत नहीं बनाया गया। दरअसल, यह कई पुराने राष्ट्रीय राजमार्गों को मिलाकर तैयार किया गया है। पहले मौजूद NH-1A, NH-1, NH-2, NH-3, NH-7, NH-26 और NH-75 जैसे हाईवे बाद में एकीकृत किए गए। इन्हें जोड़कर उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर का रूप दिया गया, जो राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। इस बदलाव से लंबी दूरी की यात्रा आसान हुई और राज्यों के बीच सीधी कनेक्टिविटी संभव हो सकी।
किसकी जिम्मेदारी में हुआ निर्माण
NH-44 का निर्माण किसी एक एजेंसी ने नहीं किया। इसके अलग-अलग हिस्सों को अलग-अलग चरणों में विकसित किया गया। मैदानी इलाकों, पहाड़ी क्षेत्रों, सुरंगों और बायपास के हिसाब से तकनीक और लागत तय की गई। कई सेक्शन सरकारी एजेंसियों ने बनाए, जबकि कई जगहों पर पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल अपनाया गया, जिसमें निजी कंपनियों की भी भागीदारी रही।
अलग-अलग हिस्सों पर अलग लागत
NH-44 पर खर्च की गई राशि किसी एक आंकड़े में नहीं बताई जा सकती, क्योंकि हर सेक्शन की लागत अलग रही। इसमें जम्मू-कश्मीर के बनिहाल बायपास पर लगभग ₹224 करोड़ खर्च हुए, श्रीनगर-बनिहाल कॉरिडोर में 4-लेन सड़क के लिए करीब ₹16,000 करोड़ की लागत आई, तमिलनाडु के थोपपुर घाट क्षेत्र में 4 किमी एलिवेटेड रोड पर ₹905 करोड़ खर्च किए गए, हरियाणा में दिल्ली-पानीपत हिस्से पर फ्लाईओवर और ग्रीनफील्ड रोड के लिए ₹2,500 करोड़ से ज्यादा की राशि लगील इसके अलावा हैदराबाद-बेंगलुरु सेक्शन को सुपर इंफॉर्मेशन रोड के रूप में विकसित करने पर लगभग ₹14,000 करोड़ का अनुमानित खर्च आया।