
नईदुनिया प्रतिनिधि, बिलासपुर। बिलासपुर शहर के बहुचर्चित संजू त्रिपाठी हत्याकांड में पुलिस की लंबी जांच और करीब 1500 पन्नों के चालान के बावजूद अभियोजन पक्ष अदालत में हत्या की साजिश और आरोपियों की भूमिका साबित नहीं कर सका। दसवें अपर सत्र न्यायाधीश आदित्य जोशी ने मामले में संजू के भाई कपिल त्रिपाठी समेत सभी 22 आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।
सुनवाई के दौरान अभियोजन के लिए सबसे बड़ा झटका यह रहा कि पुलिस के बनाए दो प्रमुख चश्मदीदों में से एक की गवाही दर्ज नहीं हो सकी, जबकि दूसरा अपने पूर्व बयान से मुकर गया। इससे अभियोजन की कहानी को प्रत्यक्षदर्शी का अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया। कसर पुलिस की जांच ने पूरी कर दी, जिसमें हिस्ट्रीशीटर को कितनी गोली लगी थी तक बता सके। बंदूक-गोली का मिलान भी नहीं कर सके।
पुलिस ने मोहम्मद सरफराज और मोनिश खंडेकर को घटना का प्रमुख चश्मदीद बताया था। बचाव पक्ष के अनुसार, इनमें से एक गवाह अदालत में उपस्थित नहीं हुआ और दूसरे ने अभियोजन के पक्ष में गवाही नहीं दी। ऐसे में हत्या को अंजाम देने वालों और कथित साजिशकर्ताओं के बीच संबंध स्थापित करने के लिए अभियोजन को दूसरे साक्ष्यों पर निर्भर रहना पड़ा। लेकिन तकनीकी और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ियां भी आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं बन सकीं।
इसके साथ ही 14 दिसंबर को शाम 4.15 बजे घटना के बाद मृतक संजू की पत्नी किरण की सूचना पर बिना अस्पताली मेमो के आधार पर मर्ग और कुछ देर के बाद गोली मारकर हत्या करने का अपराध भी दर्ज कर लिया था, जबकि डाक्टर ने संजू की मौत होने का मेमो 15 घंटे बाद दिया था।
बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने आरोपियों के बीच कथित संपर्क साबित करने के लिए पेश काल डिटेल, मोबाइल टावर से मिली जानकारी और अन्य इलेक्ट्रानिक साक्ष्यों की प्रमाणिकता पर सवाल उठाए। दलील दी गई कि दूरसंचार कंपनियों के अधिकृत अधिकारियों से जरूरी प्रमाणन और साक्ष्य की वैधानिक पुष्टि की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। बचाव पक्ष ने यह भी सवाल उठाया कि इलेक्ट्रॉक रिकॉर्ड से आरोपियों की कथित भूमिका किस तरह साबित होती है।
बचाव पक्ष ने फोरेंसिक और बैलिस्टिक जांच को भी चुनौती दी। दलील थी कि बरामद हथियारों और घटनास्थल से मिले कारतूस या गोलियों के बीच ऐसा निर्णायक मिलान सामने नहीं आया, जिससे आरोपियों को सीधे हत्या से जोड़ा जा सके। पुलिस की ओर से फायरिंग के राउंड और बरामद गोलियों की संख्या को लेकर भी बचाव पक्ष ने सवाल उठाए।
उसका कहना था कि इन परिस्थितियों में हथियारों की बरामदगी को हत्या में इस्तेमाल का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। पुलिस ने पहले 13 राउंड फायरिंग होने का दावा किया था, लेकिन मृतक संजू के शरीर से तीन बुलेट ही मिले थे। इसके बाद पुलिस ने उसके अंतिम संस्कार के तीन दिनों के बाद अस्थियां उठाने के दौरान छह गोलियां और बरामद की थी। यह सभी संदेह के दायरे में था।

14 दिसंबर 2022 को सकरी बायपास स्थित खनिज बैरियर के पास संजू त्रिपाठी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना के समय वु अपनी सफेद रंग की एमजी हेक्टर कार में सवार था। पुलिस ने जांच में पारिवारिक और संपत्ति विवाद को हत्या की वजह बताते हुए उसके भाई कपिल त्रिपाठी को मुख्य साजिशकर्ता बताया था।
पुलिस का दावा था कि हत्या के लिए उत्तर प्रदेश से शूटर बुलाए गए थे और स्थानीय लोगों की मदद से वारदात को अंजाम दिया गया। पुलिस ने संपत्ति विवाद पर कहानी बनाई थी, लेकिन कोर्ट में पुलिस उस संपत्ति को ही साबित नहीं कर पाई, जिसे लेकर विवाद का दावा किया गया था। कोर्ट ने इसे भी गंभीर खामी माना।
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बचाव पक्ष ने संपत्ति विवाद को हत्या की साजिश का पर्याप्त प्रमाण मानने पर भी आपत्ति की। अधिवक्ताओं का तर्क था कि किसी विवाद या रंजिश की मौजूदगी अपने आप में हत्या की साजिश और आरोपियों की भागीदारी साबित नहीं करती। इसके लिए ठोस और आपस में जुड़ने वाले साक्ष्य जरूरी हैं।
बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने विवेचना और साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। अदालत ने अभियोजन के मामले को आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं पाया और सभी 22 आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।
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