
विनोद सिंह, नईदुनिया, जगदलपुर: हस्तशिल्प के क्षेत्र में बस्तर के आदिवासी कलाकारोंं की पुराने समय से ही प्रसिद्धि रही है। यहां के चित्रकार अब चित्रकारी में भी अपना कला का लोहा मनवा रहे हैं। इस क्षेत्र में बस्तर में नारायणपुर जिले का शिल्पकारों और चितरों के गढ़ के नाम से चर्चित ग्राम गढ़बेगाल के मुरिया आदिवासी कलाकार पिसाडूराम सलाम को राजस्थान के गुलाबी शहर जयपुर में आयोजित वेंदाता जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में 16 जनवरी को उनकी पेंटिंग लंगूर राजा के लिए ‘ओजस आर्ट अवार्ड-2026’ से सम्मानित किया गया।

उल्लेखनीय है कि समारोह में ही पेंटिंग तैयार करने की प्रतिस्पर्धा थी। 78 वर्षीय पिसाडूराम मंडावी काष्ठशिल्पी हैं और चित्रकारी में भी निपुण हैं। कक्षा तीसरी तक पढ़ाई करने के बाद पिसाडूराम सलाम गांव और परिवार के अन्य सदस्यों की तरह शिल्पकारी को अपना पेशा बना लिया था। काष्ठशिल्प के साथ चित्रकारी में उनकी दक्षता है।

उनकी बनाई गई पेंटिंग भारत भवन भोपाल, मानव विज्ञान संग्राहालय भोपाल और जगदलपुर, गुरु घासीदास संग्राहालय रायपुर आदि कई नामचीन संस्थानों में शोभायमान हैं। उनके नाती युवा शिल्पी और चित्रकार बलदेव मंडावी ने बताया कि सितंबर 2025 मेंं पिसाडूराम सलाम की एक पेंंटिंग मुंबई में पंडोलेस नीलामी घर में तीन लाख 20 हजार रुपये मेंं बिकी थी।

पिसाडूराम सलाम अंचल के अन्य आदिवासी कलाकारों की ही तरह जंगल और ग्रामीण जीवन से गहराई से जुड़े हैं। मुख्यत: बस्तर की आदिवासी संस्कृति, प्रकृति और वन्यजीव व देवी-देवताओं की पेंटिंग बनाने वाले पिसाडूराम सलाम इन पात्रों की उर्जा को जीवंत ढंग से रंगो के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं।

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पिसाडूराम के दामाद पद्यश्री पंडीराम मंडावी ने नईदुनिया को बताया कि गढ़बेंगाल में जयराम, बलदेव आदि एक दर्जन से अधिक शिल्पी चित्रकारी भी करते हैं। यहीं के स्वर्गीय बेलगुर मंडावी, शंकर मंडावी चित्रकला के क्षेत्र में बड़े नाम हुए हैं। हमारी कला मुरिया चित्रकला के नाम से प्रसिद्ध है। पहले चित्रकारी के लिए प्राकृतिक रंगों सेमी के पत्तों, पलाश के फूलों के रस और कोयला, छुई मिट्टी, गेरू आदि के रंगों का उपयोग किया था अब इनका प्रचलन सीमित हो गया है। रासायनिक रंगो का प्रचलन बढ़ गया है।