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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 29, 2025 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

पढ़ाई से ज्यादा मोबाइल चलाने में माहिर बच्चे, छत्तीसगढ़ में शिक्षा के स्तर की तस्वीर आई सामने

एनुअल स्टेट्स ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर रिपोर्ट) 2024 के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में 14 से 16 वर्ष के 82.5 विद्यार्थी स्मार्ट फोन यानी मोबाइल का इस्तेमाल करन...और पढ़ें

By Shashank Shekhar BajpaiEdited By: Shashank Shekhar Bajpai
Publish Date: Wed, 29 Jan 2025 02:31:12 PM (IST)Updated Date: Wed, 29 Jan 2025 02:31:12 PM (IST)
पढ़ाई से ज्यादा मोबाइल चलाने में माहिर बच्चे, छत्तीसगढ़ में शिक्षा के स्तर की तस्वीर आई सामने
मोबाइल के आदी हो रहे बच्चे। -फाइल फोटो।

HighLights

  1. चौंकाने वाली है रिपोर्ट, अपने बच्चों पर ध्यान देना जरूरी है।
  2. प्रदेश के 834 गावों में तीन से 16 वर्ष तक के बच्चों का सर्वे।
  3. 31,099 बच्चों के रिस्पांस के आधार पर किया गया आकलन।

संदीप तिवारी, रायपुर। डिजिटल युग में बच्चे पढ़ाई-लिखाई में तो कमजोर हैं, लेकिन मोबाइल, स्मार्टफोन चलाने में माहिर हैं। एनुअल स्टेट्स ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (असर रिपोर्ट) 2024 के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में 14 से 16 वर्ष के 82.5 विद्यार्थी स्मार्ट फोन यानी मोबाइल का इस्तेमाल करना जानते हैं।

93.3 प्रतिशत घरों में स्मार्टफोन का इस्तेमाल किया जा रहा है। 89.8 प्रतिशत बच्चों को मोबाइल में वीडियो साझा करना, यूट्यूब और वाट्सएप चलाना भी आता है। वहीं, पढ़ाई-लिखाई पर गौर करें, तो असर की रिपोर्ट चौंकाने वाले तथ्य उजागर करती है।


16 हजार परिवारों से जुटाई जानकारी

इसके मुताबिक, राज्य के निजी और सरकारी स्कूलों में कक्षा तीन के 25 प्रतिशत बच्चे ही कक्षा दो की किताब को पढ़ पाते हैं। इसी तरह कक्षा पांचवीं के 54.3 प्रतिशत बच्चे ही कक्षा दूसरी का पाठ पढ़ पाते हैं। आठवीं के 76 प्रतिशत बच्चे कक्षा दूसरी के पाठ पढ़ पाते हैं।

यानी इस उम्र के 24 प्रतिशत बच्चे जो कि स्मार्ट फोन तो चला लेते हैं। मगर, कक्षा दूसरी की किताब पढ़ने में असक्षम हैं। असर की रिपोर्ट के अनुसार, ये सर्वे प्रदेश के 834 गावों में किया गया है। इनमें 16,500 परिवारों से जानकारी जुटाई गई है। इनमें तीन से 16 वर्ष के 31,099 बच्चों के रिस्पांस के आधार पर आकलन किया गया है।

गणित में भी बुरा हाल

गणित में 23.3 प्रतिशत कक्षा तीसरी के बच्चे कक्षा दूसरी के स्तर का जोड़-घटाना, गुणा-भाग कर पाते हैं। कक्षा पांचवीं के 25.7 प्रतिशत बच्चों को भाग करना आता है। इसी तरह कक्षा आठवीं में 36.4 प्रतिशत बच्चों को गुणा-भाग करना आता है।

बच्चों के शिक्षा स्तर का मूल्यांकन घर-घर जाकर किया जाता है। तीन से 16 वर्ष की आयु के बच्चों को इसमें शामिल किया जाता है। देशभर में यह मूल्यांकन 19 भाषाओं में किया जाता है। इसके साथ ही, बच्चों के स्कूल (सरकारी या निजी) में नामांकन की जानकारी भी दर्ज की जाती है।

एक्सपर्ट व्यू

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मोबाइल की लत से आंखें खराब होने का खतरा

बच्चों को मोबाइल कम से कम देना चाहिए। बच्चों का मोबाइल की लत होने के चलते पढ़ाई करने में मन नहीं लगता है। मोबाइल में जो वीडियो आते हैं, इससे वे आकर्षित होते हैं। ज्यादा देर तक मोबाइल देखने से दृष्टिदोष बढ़ने का खतरा रहता है। बच्चे स्मार्टफोन चलाने के दौरान पलकें कम झपकाते हैं। इसे कंप्यूटर विजन सिंड्रोम कहते हैं। माता-पिता ध्यान दें कि स्क्रीन का सामना आधा घंटे से अधिक न हो। आंखें सीधे प्रभावित होने से बच्चों को जल्दी चश्मा लगने, आंखों में जलन और सूखापन, थकान जैसी दिक्कतें हो रही हैं। - डॉ. दिनेश मिश्रा नेत्र विशेषज्ञ, रायपुर

प्राइमरी में कक्षा तीन का स्तर खराब

  • 8.1% बच्चों की पढ़ाई इतनी खराब है कि वो अक्षर भी नहीं पहचान सकते हैं। ‌
  • 27.9% बच्चे केवल अक्षर पढ़ सकते हैं, लेकिन शब्द या उससे आगे नहीं।
  • 20.3% बच्चे शब्द पढ़ सकते हैं, लेकिन कक्षा एक के स्तर की किताब या उससे ऊपर नहीं। ‌
  • 18.8% बच्चे कक्षा एक के स्तर की किताब पढ़ सकते हैं, लेकिन कक्षा दो के स्तर की किताब नहीं। ‌
  • 24.9% बच्चे कक्षा दो के स्तर की किताब पढ़ सकते हैं, लेकिन उससे ऊपर की नहीं पढ़ सकते हैं।

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व्यवस्था हाल-ए-आज

  • 96.3 प्रतिशत बच्चों को मिड डे मील का लाभ।‌
  • 81.1 प्रतिशत स्कूलों में पीने का पानी उपलब्ध। ‌
  • 73.6% स्कूलों में टॉयलेट इस्तेमाल करने लायक। ‌
  • 47.1 स्कूलों में लाइब्रेरी इस्तेमाल करते हैं बच्चे। ‌
  • 96 प्रतिशत स्कूलों में है बिजली की व्यवस्था।

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स्मार्ट फोन की लत से एकाग्रता क्षमता हो रही कम

एकाग्रता कम होने में बच्चे पढ़ाई-लिखाई में कमजोर हो रहे हैं। कम उम्र में स्मार्टफोन की लत की वजह बच्चे सामाजिक तौर पर विकसित नहीं हो पाते हैं। बाहर खेलने न जाने की वजह से उनके व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता। वे भावनात्मक रूप से कमज़ोर होते जाते हैं। कई हिंसक गेम्स बच्चों में आक्रामकता को बढ़ावा देते हैं। जब उनकी यह आदत बदलने की कोशिश की जाती है तो वो चिड़चिड़े, आक्रामक और कुंठाग्रस्त हो जाते हैं। - डॉ. वर्षा वरवंडकर कैरियर विशेषज्ञ