
नईदुनिया प्रतिनिधि, रायपुर। 19 जनवरी 2025 की वह तारीख मेरे और मेरे परिवार के लिए कभी न भरने वाला जख्म है। उस दिन मैं अपने सात वर्षीय बेटे पुष्कर और पड़ोस के किराएदार की बेटी को कटोरा तालाब उद्यान घुमाने ले जा रहा था। बच्चे बहुत जिद कर रहे थे। पहले मैंने मना किया, लेकिन उनकी खुशी के आगे झुक गया। मुझे नहीं पता था कि यह फैसला मेरी पूरी जिंदगी को अंधेरे में धकेल देगा।
संतोषी नगर से निकलते ही पचपेड़ी नाके से करीब एक किलोमीटर पहले अचानक मेरे बेटे पुष्कर के गले में चाइनीज मांझा फंस गया। कब फंसा, कैसे फंसा कुछ समझ ही नहीं पाया। पहले तो बच्चा भी नहीं समझ सका। थोड़ी देर बाद वह तड़पने लगा। मैंने गाड़ी रोकी, देखा उसके गले से खून बह रहा था।
मैंने घबराकर खून रोकने की कोशिश की, लेकिन वह रुक ही नहीं रहा था। तब देखा कि मांझा उसके गले में बुरी तरह धंसा हुआ था। पास के एक अंकल दौड़कर आए, उनकी मदद से हम सबसे पहले टिकरापारा में गुडविल्स हॉस्पिटल पहुंचे, लेकिन वहां कहा गया कि इलाज संभव नहीं है। एंबुलेंस की व्यवस्था कर देते हैं, आप बड़े हॉस्पिटल में ले जाइए।
हम एंबुलेंस से बाल गोपाल अस्पताल पहुंचे, लेकिन रविवार होने के कारण ऑपरेशन की व्यवस्था नहीं हो पाई। वहां से आंबेडकर अस्पताल गए, लेकिन वहां पहुंचते ही मेरा पुष्कर मुझे छोड़कर इस दुनिया से चला गया। मैं उसे तड़पते हुए देखता रहा, लेकिन बचा नहीं सका। अगर समय पर ऑपरेशन हो जाता तो शायद आज मेरा पुष्कर जिंदा होता।
मांझे ने उसका गाल काट दिया था। सांस की नली तक कट चुकी थी। वह सांस नहीं ले पा रहा था। मेरे बच्चे के जाने के बाद मुझे शासन-प्रशासन से मदद के तौर पर सिर्फ ढाई लाख रुपये प्रदान किए गए। क्या एक बच्चे की जान की कीमत बस इतनी होती है? आज भी शहर में चाइनीज मांझा बिक रहा है।
मेरा बच्चा इस दुनिया से चला गया। कल किसी और का बच्चा भी जा सकता है। मेरी पत्नी हर त्योहार पर घंटों रोती है। कोई सुबह ऐसी नहीं होती जब आंखें नम न हों। पुष्कर हमारे घर की आस था, वह हर सुबह मेरे साथ उठता, साथ खाता, साथ सोता था। आज घर सूना है, जिंदगी खाली है। मेरा पूरा जीवन वीरान हो चुका है। अब मैं कैसे जी रहा हूं, उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकता।
चाइनीज मांझे पर प्रतिबंध सिर्फ कागजों में सिमट कर रह गया है। हर साल हादसों के बाद कार्रवाई के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर नतीजा शून्य है। खुलेआम प्रतिबंधित मांझा बिक रहा है, फिर भी न तो नियमित जांच होती है और न ही दोषियों पर सख्त कार्रवाई।
अस्पतालों में आपात स्थिति से निपटने की व्यवस्था भी नाकाफी है। समय पर इलाज और ऑपरेशन की सुविधा होती तो शायद जानें बच सकती हैं। प्रशासन की यह लापरवाही लोगों की जान पर भारी पड़ रही है।
थोड़ी सी लापरवाही किसी की पूरी दुनिया उजाड़ सकती है। खतरनाक मांझे का इस्तेमाल न करें, न ही इसे खरीदें या बेचें। अगर कहीं अवैध बिक्री दिखे तो सूचना दें। याद रखिए, आज जो खतरा किसी और के बच्चे के लिए है, कल वही आपके घर तक भी आ सकता है।