
रामकृष्ण डोंगरे, नईदुनिया,रायपुर: हर साल 12 जनवरी को देश 'राष्ट्रीय युवा दिवस' मनाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के लिए यह दिन केवल एक तिथि नहीं, बल्कि गौरवशाली इतिहास का एक जीवंत अध्याय है। बहुत कम लोग जानते हैं कि स्वामी विवेकानंद के 'नरेंद्र' से 'विवेकानंद' बनने के सफर में रायपुर की माटी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। वर्ष 1877 से 1879 के बीच किशोर नरेंद्रनाथ ने अपने जीवन के लगभग दो महत्वपूर्ण वर्ष इसी शहर में बिताए थे, जिसने उनके भविष्य के आध्यात्मिक चिंतन की नींव रखी। आइए चलते हैं तो रायपुर की यात्रा पर, जहां उनके विचारों को आगे बढ़ाया जा रहा है।
रायपुर में हवाई रास्ते से आने वाले पर्यटकों का स्वागत 2012 में स्वामी विवेकानंद के नाम पर रखे गए एयरपोर्ट से होता है, जो शहर से मात्र 15 किमी दूर स्थित है। शहर के हृदय स्थल जयस्तंभ चौक से हम मालवीय रोड होकर कोतवाली चौक पहुंचते हैं। यहां से बामुश्किल 200 मीटर दूर बायें हाथ की ओर बूढ़ापारा क्षेत्र में वह इमारत आती है, जिसे डे भवन के नाम से जाना जाता है। यहां स्वामी विवेकानंद अपने परिवार के साथ रहे थे।

यह भवन रायबहादुर भूतनाथ डे का निवास था, जो विवेकानंद के पिता विश्वनाथ दत्ता के मित्र थे। लंबे समय तक यह भवन उपेक्षित रहा, लेकिन अब छत्तीसगढ़ सरकार और रामकृष्ण मिशन के प्रयासों से इसे 'स्वामी विवेकानंद राष्ट्रीय स्मारक' के रूप में विकसित किया जा रहा है। इस स्मारक में स्वामी जी के जीवन से जुड़े प्रसंगों को डिजिटल और फिजिकल म्यूजियम के जरिए दिखाया जाएगा। जिस कमरे में नरेंद्रनाथ ध्यान लगाते थे, उसे उसकी मौलिकता के साथ सहेजने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि आने वाली पीढ़ियां उस ऊर्जा को महसूस कर सकें।
'डे भवन' के पास मौजूद एक युवा अनुराग गोलछा ने बताया कि अक्सर यहां कंटेंट क्रिएटर आते हैं, जो बिल्डिंग की रील बनाते हैं। कभी कभार ऐसे भी लोग भी आते हैं जो भवन को लेकर विशेष रुचि से चर्चा करते हैं। पिछले साल नवंबर में रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन बेलूर मठ के उपाध्यक्ष स्वामी सुहितानंद महाराज ने इस भवन का निरीक्षण किया था। अनुराग ने आगे कहा कि इस इमारत को गिराकर यहां म्यूजियम बनाने को लेकर चर्चा होती रहती है, लेकिन इस पर कोई प्रगति नजर नहीं आ रही है।
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दो वर्ष पहले तक डे भवन में ही हरिनाथ स्कूल संचालित हो रहा था, लेकिन अब इसे यहां से आधा किमी दूर नगर निगम गार्डन के पास शिफ्ट कर दिया गया है। अब हमने भी अपना रुख उसी दिशा में मोड़ लिया। हरिनाथ एकेडमी स्कूल के प्रवेश द्वार पर खड़े होते ही समय थम-सा जाता है। तीन पत्थर की प्रतिमाएं चुपचाप इतिहास की गवाही दे रही हैं-समाजसेविका आभा बोस, राय बहादुर भूतनाथ डे और उनके प्रतिभाशाली पुत्र आचार्य हरिनाथ डे।
भूतनाथ डे की पोती आभा बोस की प्रतिमा सबसे पहले आकर्षित करती है। इन्हीं ने इस स्कूल की नींव रखी थी। एक ऐसी संस्था जो आज भी शिक्षा की ज्योति जलाए हुए है। उनके प्रयासों से शुरू हुई यह यात्रा आज नर्सरी से 12वीं तक 600 से अधिक बच्चों को आलोकित कर रही है। बगल में खड़े राय बहादुर भूतनाथ डे की मूर्ति 1880 से 1900 तक के उन 20 सुनहरे वर्षों की याद दिलाती है, जब वे रायपुर म्यूनिसिपल के सेक्रेटरी रहे।

ब्रिटिश काल में उन्होंने शहर को शिक्षा, स्वच्छता और बुनियादी सुविधाओं से नवाजा, एक ऐसे प्रशासक जिन्हें 'रायपुर का ईश्वरचंद्र विद्यासागर' कहा जाता है और सबसे युवा चेहरा- हरिनाथ डे, जिनका मात्र 34 वर्ष की आयु में टाइफाइड से देहांत हो गया, पर उनकी बहुभाषी प्रतिभा आज भी चमत्कार लगती है। उन्होंने 36 भाषाओं का ज्ञान था। इतिहासकार उन्हें 'छत्तीसगढ़ का जीनियस' मानते हैं।
शहर के मध्य स्थित स्वामी विवेकानंद सरोवर (बूढ़ा तालाब) स्वामी जी की स्मृतियों का साक्षी है। कहा जाता है कि किशोर नरेंद्र यहां स्नान करने और इसके किनारे ध्यान लगाने आया करते थे। आज यहां स्वामी विवेकानंद की विश्व की सबसे बड़ी बैठी हुई प्रतिमाओं में से एक (37 फीट ऊंची) स्थापित है, जो रायपुर आने वाले हर व्यक्ति को स्वामी जी के संदेश 'उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए' की याद दिलाती है।
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रायपुर में स्वामी जी की विचारधारा को जीवित रखने का सबसे बड़ा केंद्र विवेकानंद आश्रम (रामकृष्ण मिशन) है। जीई रोड पर स्थित यह आश्रम सेवा और अध्यात्म का संगम है। वहीं, गुढ़ियारी इलाके में मौजूद विवेकानंद विद्यापीठ, कोटा जैसे संस्थान स्वामी जी के 'शिक्षा द्वारा मनुष्य निर्माण' के दर्शन को आगे बढ़ा रहे हैं। यहां बच्चों को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि नैतिक और चारित्रिक विकास की शिक्षा दी जाती है।
विद्यापीठ के संचालक डॉ. ओमप्रकाश वर्मा ने बताया कि छह अक्टूबर 1929 में जन्मे उनके बड़े भाई स्वामी आत्मानंद ने ही मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में रामकृष्ण परमहंस औऱ स्वामी विवेकानंद की भावधारा को साकार किया। रायपुर में 1957-58 में श्रीरामकृष्ण सेवा समिति के रूप में इसका गठन हुआ। बाद में 1968 में इसका विलय बेलूर मठ में होने के बाद नाम रामकृष्ण विवेकानंद आश्रम हो गया। इसके पहले संस्थापक सचिव स्वामी आत्मानंद थे।
डॉ. ओमप्रकाश ने आगे बताया कि उनके भाई का जन्म नाम तुलेन्द्र था। वे नागपुर में अध्ययन के दौरान रामकृष्ण आश्रम में रहा करते थे। इस दौरान विवेकानंद दर्शन से प्रभावित होकर उन्होंने सन्यास ले लिया। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के रायपुर प्रवास को अविस्मरणीय बनाने के उद्देश्य से रायपुर में विवेकानंद आश्रम की स्थापना की थी। इसके बाद वर्ष 1985 में नारायणपुर जिले में अबूझमाड़ के आदिवासियों के उत्थान के लिए रामकृष्ण मिशन आश्रम की स्थापना हुई थी।
वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी राहुल सिंह ने बताया कि स्वामी विवेकानंद के पिता विश्वनाथ दत्त कोलकाता के प्रसिद्ध वकील थे। व्यावसायिक कारणों से वे 1877 में रायपुर आए थे। 14 वर्षीय नरेंद्र अपने परिवार के नागपुर से बैलगाड़ी के माध्यम से यहां पहुंचे थे। बताया जाता है कि इस यात्रा में उन्हें अपने जीवन में पहली भाव-समाधि, दिव्य अनुभव हुआ था। कुछ समय वे डे भवन में रहे। कुछ समय पास ही स्थित बाड़े में रहे। यह जानकारी बेलूर मठ के एक पत्र से मिलती है।
रायपुर प्रवास के दौरान ही नरेंद्रनाथ ने अपने पिता से संगीत, शतरंज और राजनीति जैसे विषयों पर लंबी चर्चाएं की थीं। यह वह समय था जब उनमें तर्क करने और सत्य को खोजने की जिज्ञासा चरम पर थी। उन्होंने कहा कि 'डे भवन' का राष्ट्रीय स्मारक बनना न केवल पर्यटन के नजरिए से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह रायपुर को वैश्विक आध्यात्मिक मानचित्र पर एक नई पहचान दिलाएगा। रायपुर आज भी उस गौरव को अपनी छाती से लगाए हुए है कि विश्व को अध्यात्म की राह दिखाने वाला 'नरेंद्र' कभी यहां की गलियों में घुमा करता था।
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गुढ़ियारी क्षेत्र के कोटा में स्थित स्वामी विवेकानंद विद्यापीठ विवेकानंद के आदर्शों से ओतप्रोत एक जीवंत शिक्षा केंद्र है। यह परिसर फूलों से ढका हुआ लगता है, जहां रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियां और एक बड़ा हरा-भरा गार्डन मन को शांति प्रदान करता है। यहां अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के बालकों के लिए निःशुल्क आवासीय विद्यालय संचालित किया जा रहा है। डा. ओमप्रकाश वर्मा के अनुसार वर्ष 1989 में ट्रस्ट का गठन किया गया था। इसके बाद 1994 में दो कक्षाओं के साथ विद्यालय की शुरुआत हुई।

उन्होंने बताया कि यहां संचालित बीएड कालेज में स्वामी विवेकानंद की विचारधारा के अनुरूप श्रेष्ठ शिक्षकों के निर्माण का प्रयास किया जाता है, ताकि आगे चलकर यही शिक्षक देश के लिए अच्छे नागरिकों के निर्माण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान दे सकें। यहां के विभिन्न भवनों का शिलान्यास अलग–अलग समय में रामकृष्ण मठ के स्वामियों ने किया था। इनमें स्वामी सत्यरुपानंद, स्वामी निखिलात्मानंद और स्वामी गहनानंद शामिल थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री डा रमन सिंह के कार्यकाल में यहां विवेकानंद मानव प्रकर्ष संस्थान का उद्घाटन किया गया था।
जयस्तंभ चौक से जब हम जीई रोड से टाटीबंध चौक की तरफ जाते हैं तो दो किलोमीटर की दूरी पर विवेकानंद आश्रम स्थित है। यहां मंदिर, लाइब्रेरी और अन्य शैक्षणिक संस्थान स्थित है। हाल ही में यहां कालेज के छात्रों के लिए अध्ययन केंद्र की शुरुआत हुई है। जहां सुबह आठ से रात आठ बजे तक छात्र पढ़ाई कर सकते हैं। यहां की लाइब्रेरी में 400 से अधिक सदस्य जुड़े हुए हैं।
परिसर में निशुल्क चिकित्सा सुविधा भी रोजाना उपलब्ध कराई जाती है, जिसमें अक्सर विशेषज्ञ डाक्टर भी आते हैं। आश्रम के वर्तमान सचिव स्वामी योगस्थानंद है। मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती और पं. रामकिंकर महाराज यहां प्रवचन के लिए आ चुके हैं।