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भोपाल में 1947 में पहली बार पीपल चौक पर स्‍थापित हुई थी गणेश प्रतिमा, नवाबी प्रतिबंधों को किया था दरकिनार

15 अगस्त 1947 को जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था, तब भोपाल नवाबी शासन के अधीन था और भोपाल के भारत में विलय के लिए विलीनीकरण आंदोलन चल रहा था। उस ...और पढ़ें

By Sushil PandeyEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Sat, 19 Sep 2026 11:01:26 AM (IST)Updated Date: Sat, 19 Sep 2026 11:10:40 AM (IST)
भोपाल में 1947 में पहली बार पीपल चौक पर स्‍थापित हुई थी गणेश प्रतिमा, नवाबी प्रतिबंधों को किया था दरकिनार
भोपाल में गणेशोत्‍सव की कहानी।

HighLights

  1. 1947 में पहली बार पीपल चौक में स्थापित हुई थी श्रीगणेश प्रतिमा।
  2. विलीनीकरण आंदोलन से जुड़ा है झांकी का गौरवशाली इतिहास।
  3. यह भोपाल के सांस्कृतिक स्वाभिमान, ऐतिहासिक संघर्ष का प्रतीक हैं।

भोपाल। राजधानी भोपाल का दिल कहे जाने वाले पुराने शहर के पीपल चौक (गणेश चौक) पर विराजे ''''भोपाल के राजा'''' केवल एक धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं हैं, बल्कि यह भोपाल के सांस्कृतिक स्वाभिमान, सामाजिक एकजुटता और ऐतिहासिक संघर्ष का प्रतीक हैं। सन 1947 से अनवरत चली आ रही यह परंपरा आज 80वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है, लेकिन इसकी भव्यता और पौराणिक मर्यादाएं आज भी वही है।

15 अगस्त 1947 को जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था, तब भोपाल नवाबी शासन के अधीन था और भोपाल के भारत में विलय के लिए विलीनीकरण आंदोलन चल रहा था। उस दौर में रियासत सरकार द्वारा हिंदू धार्मिक शोभायात्राओं और आयोजनों पर सख्त प्रतिबंध लागू थे।


भाद्रपद माह में निकलने वाले पारंपरिक ''''डोल ग्यारस'''' जुलूस पर भी रोक थी, जिसमें राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं को डोले में विराजमान कर जलाशयों में स्नान कराने ले जाया जाता था।

इसी दौरान सामाजिक समरसता कायम करने और देशवासियों को एकजुट करने के लिए बाल गंगाधर तिलक द्वारा सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत महाराष्ट्र में की जा चुकी थी।

उसी से प्रेरणा लेकर सांस्कृतिक दमन और प्रतिबंधों का रचनात्मक प्रतिरोध करने के लिए शहर के प्रबुद्ध नागरिकों, विलीनीकरण आंदोलन के नेता स्व उद्धव दास मेहता और मोहनलाल सिंहल ने अन्य समाजसेवियों के साथ मिलकर एक ऐतिहासिक कदम उठाया। उन्होंने श्री डोल ग्यारस समारोह समिति का गठन किया और पीपल चौक पर भोपाल की पहली सार्वजनिक श्री गणेश प्रतिमा स्थापित की।

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अनंत चतुर्दशी नहीं, डोल ग्यारस पर विसर्जन की अनोखी परंपरा

  • समिति ने एक दूरदर्शी युक्ति अपनाई। शहर के सभी मंदिरों के पुजारियों और श्रद्धालुओं का आह्वान किया गया कि वे गणेश चतुर्थी से पूजन आरंभ करें।
  • डोल ग्यारस के दिन भगवान गणेश की प्रतिमा के पीछे-पीछे अपने-अपने डोल लेकर चल समारोह में शामिल हों।
  • शासन प्रशासन के लिए इस जनसैलाब को रोकना असंभव हो गया। इसी रणनीति के तहत ''''भोपाल के राजा'''' का विसर्जन अनंत चतुर्दशी (10वें दिन) के बजाय आठवें दिन यानी ''''डोल ग्यारस'''' को करने की परंपरा पड़ी, जो आज 80 वर्षों बाद भी पूरी निष्ठा के साथ निभाई जा रही है।

  • इस आयोजन ने तत्कालीन भोपाल के हिंदू समाज को संगठित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
  • चांदी के सिंहासन से ''''भोपाल के राजा'''' बनने का सफर

    पीपल चौक पर स्थापित होने वाली यह प्रतिमा प्रारंभ से ही अपने मूल और पौराणिक स्वरूप में विराजमान होती आ रही है। छह फीट ऊंची इस प्रतिमा के साथ उनकी पत्नियां देवी रिद्धि-सिद्धि और पुत्र शुभ-लाभ भी स्थापित किए जाते हैं। वर्ष 2007 में भगवान गणेश को पहली बार भव्य चांदी के सिंहासन पर विराजमान कराया गया, जिसके बाद से भक्तों ने उन्हें प्रेम और आदर से ''''भोपाल के राजा'''' की उपाधि दी।

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    छप्पन भोग की परंपरा

    वर्ष 2004 में पहली बार मथुरा के कुशल कारीगरों द्वारा तैयार 56 भोग अर्पित किए गए थे। तब से हर साल गणेश भक्तों के सहयोग से यह परंपरा निरंतर जारी है।

    छह मन लड्डुओं का हवन भोग

    उत्सव की दशमी तिथि को आयोजित विशेष हवन में भगवान लंबोदर को छह मन (लगभग 240 किग्रा) मोदक/लड्डुओं का महाभोग अर्पित किया जाता है।

    डिजिटल दौर में परंपरा और आधुनिकता का संगम

    श्री डोल ग्यारस समिति के संरक्षक दीपक गोयल ने बताया कि समय बदलने के साथ समिति ने अपनी सीमाओं का विस्तार भी किया है। इस वर्ष आयोजन पर लगभग 15 रुपये लाख का बजट रखा गया है।

    दैनिक स्तर पर ताजे फूलों से अनूठा श्रृंगार और छप्पन भोग चढ़ाया जाता है। देश और विदेश में बसे भोपाल वासियों के लिए समिति पिछले दस वर्षों से अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम पेज पर रोजाना होने वाली भव्य आरती का सीधा प्रसारण (लाइव स्ट्रीमिंग) कर रही है।

    80 सालों से बिना किसी बदलाव के अपनी मूल पौराणिक विधि-विधान से आयोजित होने वाला यह गणेशोत्सव आज भी भोपाल की गंगा-जमुनी तहजीब और ऐतिहासिक विरासत का सजीव प्रमाण है।