
लाइफस्टाइल डेस्क। भागदौड़ भरी इस दुनिया में जहां सफलता का पैमाना सिर्फ 'ग्रेड्स' और 'रैंक' बनकर रह गया है, वहां हमारे बच्चे एक अनजाने दबाव में जी रहे हैं। स्कूल का बस्ता तो भारी है ही, लेकिन उससे कहीं ज्यादा भारी वह उम्मीदें हैं जो समाज और परिवार उन पर लाद देते हैं। अक्सर बच्चे अपने कमरे के बंद दरवाजे के पीछे बहुत कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन डर और झिझक के कारण खामोश रह जाते हैं।
अगर आप एक अभिभावक हैं, तो अपने बच्चे के मन की इन 5 अनकही परतों को समझना आपके लिए बेहद जरूरी है:
जब हम किसी दूसरे बच्चे की सफलता का उदाहरण अपने बच्चे को देते हैं, तो हमें लगता है कि हम उसे 'मोटिवेट' कर रहे हैं। लेकिन हकीकत में, बच्चा अंदर से टूट रहा होता है। हर टीनेजर का मन कहता है "मम्मी-पापा, मैं शर्मा जी का बेटा नहीं हूँ। मुझमें अपनी खूबियाँ हैं, शायद मैं गणित में कमजोर हूँ पर संगीत में बेहतर। प्लीज, मेरी तुलना करके मेरी काबिलियत पर सवाल मत उठाइए।"
अंकों की दौड़ ने बच्चों को एक 'मार्क्स मशीन' बना दिया है। कम नंबर आने पर बच्चा पहले से ही डरा होता है, ऐसे में माता-पिता की नाराजगी उसे डिप्रेशन की ओर धकेल सकती है। बच्चा बस इतना चाहता है कि परीक्षा के बाद आप उससे यह न पूछें कि "कितने आए?", बल्कि यह कहें— "तूने मेहनत की, वही काफी है। अंक चाहे जो हों, मैं हमेशा तेरे साथ हूँ।"
सुबह 7 बजे से रात 10 बजे तक स्कूल, ट्यूशन और होमवर्क के चक्र में बच्चा थक जाता है। अगर आपका बच्चा कभी बस छत को निहारना चाहता है या कुछ देर मोबाइल या गेम खेलना चाहता है, तो उसे 'समय की बर्बादी' न समझें। उसे भी दिमागी थकान होती है और उसे 'रिचार्ज' होने के लिए अपना खाली समय (Personal Space) चाहिए।
अक्सर जब बच्चा अपनी कोई परेशानी साझा करता है, तो माता-पिता तुरंत 'लेक्चर' या समाधान देना शुरू कर देते हैं। टीनेजर्स को अक्सर सुझावों की नहीं, बल्कि एक 'लिसनर' (सुनने वाले) की जरूरत होती है। वे चाहते हैं कि आप बस उनकी बात सुनें, बिना यह बताए कि उन्होंने कहाँ गलती की। कभी-कभी बस "मैं हूँ ना" कहना ही सबसे बड़ी दवा बन जाता है।
सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई यह है कि बच्चे पढ़ाई से ज्यादा इस बात से डरते हैं कि वे आपको 'निराश' कर देंगे। उनके मन में यह डर बैठ जाता है कि अगर वे अच्छा नहीं कर पाए, तो शायद आपका प्यार कम हो जाएगा। उन्हें यह भरोसा दिलाना आपकी जिम्मेदारी है कि आपका स्नेह उनके रिजल्ट या करियर की सफलता का मोहताज नहीं है।
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आज का कॉम्पीटीशन कल से कहीं ज्यादा कठिन है। आपका बच्चा एक ऐसे युद्ध में है जहाँ हर तरफ तुलना है। आज जब वह स्कूल या कोचिंग से घर आए, तो उससे यह न पूछें कि "आज क्या सीखा?", बल्कि उसके पास बैठकर बस इतना पूछें "बेटा, आज तुम्हारा दिन कैसा रहा? क्या तुम खुश हो?"
याद रखिए, एक टूटा हुआ ग्रेड सुधारा जा सकता है, लेकिन एक टूटा हुआ बचपन और विश्वास जोड़ना बहुत मुश्किल होता है।