
लाइफस्टाइल डेस्क। बदलती जीवनशैली, अनियंत्रित खान-पान और दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल से किडनी से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। चिंता की बात यह है कि युवाओं में भी किडनी डैमेज के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। अधिकांश मामलों में किडनी की खराबी के शुरुआती लक्षण नजर नहीं आते। जब बीमारी गंभीर स्तर पर पहुंच जाती है, तब पैरों में सूजन, पेशाब में झाग आना, चलने पर सांस फूलना और शरीर में हीमोग्लोबिन की लगातार कमी जैसे लक्षण उभरते हैं।
जिन लोगों के परिवार में किडनी रोग का इतिहास रहा हो या जो लंबे समय से डायबिटीज से पीड़ित हैं, वे हाई-रिस्क श्रेणी में आते हैं। अनियंत्रित डायबिटीज सीधे तौर पर किडनी की फिल्टरिंग क्षमता को नुकसान पहुंचाती है। ऐसे मरीजों को समय-समय पर क्रिएटिनिन और यूरिन टेस्ट कराते रहना चाहिए, ताकि बीमारी को शुरुआती दौर में ही पकड़ा जा सके और स्थिति बिगड़ने से रोकी जा सके।
बिना डॉक्टर की सलाह के लंबे समय तक पेनकिलर्स खाना किडनी फेलियर का एक प्रमुख कारण बन रहा है। इसके अलावा, बिना विशेषज्ञ की देखरेख के लंबे समय तक जरूरत से ज्यादा प्रोटीन डाइट या सप्लीमेंट्स लेने से भी किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, जिससे इसके खराब होने का जोखिम रहता है।
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भोजन में अत्यधिक नमक, जंक फूड का अधिक सेवन और कीटनाशकों (पेस्टिसाइड्स) से दूषित खाद्यान्न भी किडनी को भारी नुकसान पहुंचाती हैं। साथ ही, कई क्षेत्रों के पानी में घुले अत्यधिक खनिज हेवी मिनरल्स भी किडनी स्टोन और क्रॉनिक किडनी डिजीज का कारण बनते हैं। इसलिए किडनी को सुरक्षित रखने के लिए बिना डॉक्टरी सलाह के पेनकिलर लेने से बचें और जंक फूड से दूरी बनाएं।
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डाॅ. रितेश बनोदे, नेफ्रोलॉजिस्ट के अनुसार यदि किसी को किडनी से जुड़ी कोई समस्या डिटेक्ट हो चुकी है, तो उसे तुरंत हाई-प्रोटीन डाइट बंद कर देनी चाहिए। ऐसे मरीजों को विशेषज्ञ की सलाह से ''''लो-प्रोटीन डाइट'''' अपनानी चाहिए। इसमें भी मांसाहारी या एनिमल प्रोटीन पूरी तरह छोड़कर केवल दालों एवं प्लांट-बेस्ड आधारित प्रोटीन का ही सीमित मात्रा में इस्तेमाल करना चाहिए, जिससे किडनी पर अतिरिक्त लोड न पड़े।