
लाइफस्टाइल डेस्क। जब भी किसी को लोहे से चोट लगती है, तो सबसे पहले मन में 'टिटनेस के इंजेक्शन' का ख्याल आता है। संक्रमण के डर से हम तुरंत डॉक्टर के पास भागते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर छोटी-बड़ी चोट पर टिटनेस का टीका लगवाना वाकई अनिवार्य है? डॉक्टर के अनुसार, यदि टीकाकरण का शेड्यूल सही तरह से पूरा किया गया है, तो बार-बार इंजेक्शन की आवश्यकता नहीं होती।
बच्चों को बचपन में ही DPT (डिप्थीरिया, परट्युसिस और टिटनेस) का टीका लगाया जाता है। इसका एक निश्चित अंतराल होता है। इसके शुरुआती टीके 1.5 से 3.5 महीने की उम्र में लगते हैं, जबकि बूस्टर डोज 1.5 साल, 5 साल, 10 साल और फिर 15 साल की उम्र में लगते हैं। यदि किसी बच्चे को 5 साल की उम्र में बूस्टर डोज लग चुका है और 6 साल की उम्र में उसे चोट लगती है, तो उसे दोबारा इंजेक्शन की जरूरत नहीं होती क्योंकि शरीर में एंटीबॉडीज पहले से मौजूद होती हैं।
आम धारणा है कि टिटनेस के इंजेक्शन का असर केवल 6 महीने रहता है, जबकि वास्तविकता में यह 10 साल तक प्रभावी रहता है। मामूली चोट में हर 10 साल में एक बार टीका पर्याप्त है। केवल बड़े एक्सीडेंट या गहरे घाव की स्थिति में ही इसे 5 साल के अंतराल पर दोहराने की सलाह दी जाती है।
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इंजेक्शन लगवाने की जल्दबाजी से पहले प्राथमिक उपचार (First Aid) अधिक महत्वपूर्ण है।
चोट वाली जगह को बहते साफ पानी से अच्छी तरह धोएं ताकि धूल और जंग निकल जाए।
सफाई के बाद कोई अच्छी एंटीसेप्टिक क्रीम लगाएं।