
नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल: अक्सर देखा गया है कि कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के बाद भी कैंसर पूरी तरह खत्म नहीं होता। एम्स भोपाल के डॉक्टरों ने अपनी नई रिसर्च में इसकी एक बड़ी वजह खोजी है। एम्स भोपाल के जैव रसायन विभाग की नई शोध में सामने आया है कि कैंसर की गांठ (ट्यूमर) यानी शरीर के ऊतकों में 'आक्सीजन की कमी' ही उसे खतरनाक बना देती है।
एम्स भोपाल के जैवरसायन विभाग के डॉ. सुखेस मुखर्जी ने बताया कि शरीर के जिस हिस्से में कैंसर की गांठ होती है, वहां रक्त का संचार अनियमित हो जाता है, जिससे उस ट्यूमर के भीतर आक्सीजन की भारी कमी हो जाती है। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को 'हाइपाक्सिया' कहा जाता है। डॉ. मुखर्जी के अनुसार, आक्सीजन की यह कमी कैंसर कोशिकाओं के लिए एक 'सुरक्षा कवच' का काम करती है।
यह ट्यूमर को इतना जिद्दी और प्रतिरोधी बना देती है कि उस पर कीमोथेरेपी की दवाएं और रेडिएशन का असर होना लगभग बंद हो जाता है। इतना ही नहीं यह स्थिति शरीर की उन प्रतिरोधी कोशिकाओं (टी-सेल्स) को भी पंगु बना देती है जो कैंसर से लड़ती हैं। इस शोध ने कैंसर के इलाज की नई राह खुलने की संभावना को बढ़ा दिया है। इस शोध को 10 जनवरी को विमोचित स्प्रिंगर नेचर जर्नल में ‘हाइपोक्सिया एंड ट्यूमर माइक्रोएनवायरनमेंट: इम्प्लिकेशंस फॉर कैंसर थेरेपी’ नाम से प्रकाशित किया गया है।
डॉ. सुखेस मुखर्जी ने बताया कि मधुमेह (डॉयबिटीज) के इलाज में दशकों से काम आ रही दवा ''मेटफार्मिन'' और आक्सीजन सप्लीमेंटेशन की मदद से ट्यूमर के भीतर आक्सीजन के स्तर को सुधारा जा सकता है। जब ट्यूमर में आक्सीजन की मात्रा संतुलित हो जाती है, तो कीमोथेरेपी और रेडिएशन का असर कई गुना बढ़ जाता है। यह खोज विशेष रूप से स्तन, फेफड़े और अग्न्याशय के कैंसर के मरीजों को राहत मिलेगी।
डॉक्टरों का कहना है कि आधुनिक तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) की मदद से यह सटीक रूप से पता लगाया जा सकेगा कि ट्यूमर के किस हिस्से में आक्सीजन की कमी है। इससे डाक्टर पूरे शरीर पर दवाओं का बोझ डालने के बजाय सीधे प्रभावित हिस्से पर ''टारगेटेड थेरेपी'' कर सकेंगे। इससे न केवल इलाज सफल होगा, बल्कि कैंसर दवाओं के साइड इफेक्ट भी कम होंगे।
डॉ. सुखेस मुखर्जी और उनकी टीम का शोध कैंसर अनुसंधान में अहम है। ट्यूमर माइक्रोएनवायरनमेंट में हाइपाक्सिया की भूमिका को समझना भविष्य के सटीक उपचार (प्रिसिजन मेडिसिन) के लिए अत्यंत आवश्यक है।
- डॉ. माधवानन्द कर, कार्यपालक निदेशक एवं सीईओ, एम्स भोपाल