भोपाल स्लाटर हाउस केस: 35 करोड़ के आधुनिक बूचड़खाने में 'खूनी खेल', जिम्मेदार सोते रहे और अंदर होती रही गोकशी
Jinsi Gokashi Case: जिंसी में करीब 35 करोड़ रुपये की लागत से नगर निगम द्वारा बनाया गया आधुनिक स्लॉटर हाउस 17 दिसंबर को सामने आए गोकशी कांड के बाद से ल ...और पढ़ें
Publish Date: Sun, 11 Jan 2026 10:38:22 PM (IST)Updated Date: Sun, 11 Jan 2026 10:38:20 PM (IST)
35 करोड़ के आधुनिक बूचड़खाने में 'खूनी खेल'। नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। जिंसी में करीब 35 करोड़ रुपये की लागत से नगर निगम द्वारा बनाया गया आधुनिक स्लॉटर हाउस 17 दिसंबर को सामने आए गोकशी कांड के बाद से लगातार विवादों में है। जांच रिपोर्ट के आधार पर बीते गुरुवार को स्लॉटर हाउस को सील कर दिया गया, लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल निगम की वेटनरी शाखा की भूमिका को लेकर खड़ा हो रहा है। पुलिस जांच में जुटी है, जबकि निगम प्रशासन ने अब तक चुप्पी साध रखी है।
कर्मचारियों की चुप्पी से यह खेल पनपा
विभागीय सूत्रों की मानें तो स्लॉटर हाउस में यह कृत कोई नया नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहा था। प्रभारी स्लॉटर हाउस डॉ. बेनी प्रसाद गौर की गैरहाजिरी और कर्मचारियों की चुप्पी से यह खेल पनपा है, क्योंकि स्लॉटर हाउस में बाहरी व्यक्ति के प्रवेश पर पूरी तरह रोक है। मीडिया तक को अंदर जाने की अनुमति नहीं है। प्रबंधन व सुरक्षा के लिए एक डॉक्टर और सात कर्मचारी तैनात रहे हैं। ऐसे में प्रतिबंधित जानवर का अंदर पहुंचना बिना अंदरूनी मिलीभगत के संभव नहीं है।
स्लाटिंग के समय, घर पर सोते जिम्मेदार
निगम में प्रतिनियुक्ति पर आए डॉ. बेनी प्रसाद गौर स्लॉटर हाउस के प्रभारी हैं । नियमों के अनुसार उन्हें स्लॉटिंग से पहले जानवरों और स्लॉटिंग के बाद मांस की जांच कर प्रमाणित करना होता है। जांच रिपोर्ट में डाक्टर की सील अनिवार्य होती है, लेकिन सूत्र बताते हैं कि डॉ. गौर नियमित रूप से स्लॉटर हाउस जाते ही नहीं। दिन भर वे माता मंदिर स्थित कार्यालय में रहते हैं और शाम छह बजे, जब स्लॉटिंग से पहले जांच होनी होती है, उस समय अपने निवास चले जाते हैं।
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ठेकेदार तक सिमटी जांच, जिम्मेदार दूर
इस लापरवाही का सीधा फायदा पीपीपी मोड पर संचालित स्लॉटर हाउस के ठेकेदारों को मिलता रहा। पुख्ता निगरानी व्यवस्था के बावजूद गाय का स्लॉटर हाउस तक पहुंचना निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अब देखना यह है कि सीलिंग के बाद जांच सिर्फ ठेकेदार तक सिमटती है या जिम्मेदार अफसरों पर भी कार्रवाई होती है।