
टीम नईदुनिया, भोपाल। चाइनीज मांझे की धार जितने ही गहरे हैं, उसके शिकार लोगों के परिवार के जख्म। किसी ने बेटा खोया, किसी ने कमाऊ मुखिया और किसी ने सदैव खिलखिलाती बिटिया...। कई हंसते-खेलते परिवार उजड़ गए। हत्यारा मांझा ऐसे असंख्य परिवारों के लिए एक त्रासदी जैसा है। शासन, प्रशासन और पुलिस तंत्र इनके प्रति संवेदनहीन है। मांझा प्रतिबंधित है, इसका आदेश जारी करने वाले मूकदर्शक और असहाय हैं। चाइनीज मांझा पीड़ितों को न्याय नहीं मिलता- न मुआवजा मिलता है, न घायलों को उपचार और न 'हत्यारों' को सजा मिलती है। ये व्यवस्था की बड़ी खामी है, नाकामी है और जिम्मेदारों का नाकारापन।
न्यायालय के आदेश पर कुछ दिन अभियान तो चलता है, बस औपचारिकता भर। कारोबारियों के यहां छापे पड़ते हैं। माल पकड़ा जाता है, लेकिन कुछ दिन बाद मांझे के सौदागर रिहा हो जाते हैं और इसके जरिए निर्दोष लोगों की 'हत्या' करने वाले बेखौफ पतंग उड़ाते हैं। वे न तो पकड़े जाते हैं, न उनको सजा होती है, पर हादसे होते रहते हैं- हर दिन, पर सो रही व्यवस्था की नींद कब टूटेगी...पता नहीं। नईदुनिया ने चाइनीज मांझे की घटनाओं का शिकार हुए कई लोगों के परिवारों का दुख-दर्द जानने की कोशिश की तो पता लगा कि अपनों को खोने की उनकी व्यथा का कोई अंत नहीं है।
धार : मकर संक्रांति आते ही ताजा हो जाता है कनिष्क के परिवार का जख्म
10 जनवरी 2024 को मकर संक्रांति थी। उस दिन धार जिले में 11 साल का कनिष्क चाइनीज मांझे का शिकार हो गया। दो साल बाद भी इस बच्चे का परिवार उसके खोने के दर्द को नहीं भूल पाया है। कनिष्क के पिता विनोद चौहान और मां शीतल चाइनीज मांझा और उसका प्रयोग करने वालों को कोसते हैं, जिन्होंने उनके परिवार का चिराग बुझा दिया। इस परिवार के लिए मकर संक्रांति का पर्व ऐसे जख्म जैसा है, जो शायद ही कभी भर पाए। शीतल की आंखें भर आती हैं। वह कहती हैं, ‘हम नहीं चाहते कि किसी और मां की गोद इस तरह सूनी हो, इसलिए चाइनीज मांझे पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगना चाहिए।’
उज्जैन : चाइना डोर ने छीन ली बेटी, तीन साल बाद भी नहीं सूखे पिता के आंसू
उज्जैन की नेहा की कोई गलती नहीं थी…, वह तो बस सड़क पर चल रही थी। ऊपर हवा में एक अदृश्य कातिल तैर रहा था- चाइना डोर। उसी ने उसकी जिंदगी छीन ली। इस घटना को तीन साल बीत गए, लेकिन चाइनीज मांझे का शिकार हुई बेटी की यादें उज्जैन के अंतर सिंह का हर सांस के साथ उनके दिल को चीर देती हैं। वह कहते हैं- पतंगबाजी को खूनी खेल मत बनने दीजिए।
इंदौर : परिवार का 'गुलशन' उजाड़ दिया, उड़ती पतंग को देख कांप जाता है भाई
इंदौर के रालामंडल इलाके में 30 नवंबर 2025 को बाइक से भाई अरुण के साथ पिकनिक पर जा रहे 12वीं के छात्र गुलशन जाटव को क्या पता था कि यह सफर उसकी जिंदगी का आखिरी सफर बन जाएगा। चाइनीज मांझा अचानक उसकी गर्दन से लिपट गया। गुलशन ने दम तोड़ दिया। भाई अरुण की आंखें आज भी भर आती हैं। कांपती आवाज में कहते हैं- मेरा भाई कुछ बोल ही नहीं पाया…, मैं उसे आवाज देता रह गया। आज भी हर उड़ती पतंग देख कांप जाता हूं।
इंदौर : टाइल्स ठेकेदार के बच्चों को अनाथ कर दिया
इंदौर में पिछले दिनों चाइनीज मांझा की भेंट चढ़े टाइल्स ठेकेदार रघुवीर धाकड़ रोज की तरह साइट से काम खत्म कर घर लौट रहे थे। अचानक एक डोर उनके गले से लिपट गया और पल भर में उनकी जिंदगी छीन ली। उनके रिश्तेदार अशोक बताते हैं कि अब रघुवीर के बच्चे अनाथ हो गए हैं। परिवार का इकलौता कमाने वाला चला गया। जिस घर में हंसी गूंजती थी, वहां चाइनीज मांझे ने सबकुछ खत्म कर दिया।
मऊगंज : छह माह बिस्तर पर बिताए, पांच साल बाद भी बुरे सपने से कम नहीं घटना
मऊगंज जिले के शाहपुर में पांच साल पहले चाइनीज मांझे का शिकार हुए ज्ञानेंद्र विश्वकर्मा के लिए वह घटना बुरे सपने से कम नहीं है। उनके चेहरे पर धागे से चोट आई थी, गिरने से हाथों में फ्रैक्चर हो गया। करीब छह महीने का समय बिस्तर पर ही बिताया था।
छिंदवाड़ा : तीन महीने नहीं कर पाएंगे काम, गले में आए 43 टांके
गत दो जनवरी को चाइनीज मांझे की चपेट में आए रामगिरी गोस्वामी का भी गला कट गया। इससे आहार नली तक दिखाई देने लगी। डॉक्टर को तीन ऑपरेशन करने पड़े। गले में कुल 43 टांके लगाए गए। डॉक्टर ने तीन महीने आराम करने के लिए कहा है। कामकाज भी ठप है।