
नवदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। राजधानी के स्लाटर हाउस में गोकशी का मामला अब प्रशासनिक भ्रष्टाचार और संदिग्ध संरक्षण की एक ऐसी परतदार कहानी बन गया है, जिसमें पुलिस और नगर निगम के दावे एक-दूसरे की जड़ें काट रहे हैं।
जिस मुख्य आरोपित असलम चमड़ा को पुलिस ने अक्टूबर 2025 में 'दूध का धुला' बताकर क्लीनचिट दी थी, आज वही सलाखों के पीछे है और पुलिस अब नगर निगम के गलियारों में जिम्मेदार तलाश रही है।
बता दें कि अक्टूबर 2025 में तत्कालीन डीसीपी आशुतोष गुप्ता की रिपोर्ट ने सब कुछ 'ओके' करार दिया था। तब पुलिस ने केवल बयानों को आधार मानकर जांच की फाइल बंद कर दी थी। आज सवाल खड़ा है कि क्या वह जांच महज औपचारिकता थी?
राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने इंटरनेट मीडिया के माध्यम एक्स पर जब पुराना पत्र साझा किया तो प्रशासन बैकफुट पर आ गया। पत्र में न केवल गोकशी, बल्कि बांग्लादेशी रोहिंग्याओं के जुड़ाव और संदिग्ध गतिविधियों की चेतावनी भी थी, जिसे दरकिनार कर दिया गया।
नगर निगम अब इस पूरे मामले से पल्ला झाड़ रहा है। निगमायुक्त संस्कृति जैन का कहना है कि निगम ने केवल पीपीपी मोड पर जमीन दी है, संचालन का काम नहीं कर रहा था। दूसरी ओर, जहांगीराबाद पुलिस अब उन डॉक्टरों और अफसरों की सूची मांग रही है जो मांस को प्रमाणित करते थे।
सूत्रों की मानें तो रोजाना चार कंटेनर मांस विदेशों में सप्लाई होता था। सवाल यह है कि क्या प्रमाणित करने वाले डॉक्टरों को कंटेनरों में जा रहे 'गोमांस' की भनक नहीं थी?
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जांच पर सबसे बड़ा सवालिया निशान तब लगा, जब हिंदूवादी संगठनों द्वारा पकड़े गए संदिग्ध कंटेनर को पुलिस ने रिपोर्ट आने से पहले ही छोड़ दिया। जब तक मथुरा से लैब रिपोर्ट आई, तब तक वह मांस मुंबई के रास्ते विदेश रवाना हो चुका था। आखिर किसके दबाव में उस रात कंटेनर को 'एग्जिट' दिया गया?