
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। राजधानी का रानी कमलापति रेलवे स्टेशन, जिसे देश के पहले विश्वस्तरीय और अत्याधुनिक पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल स्टेशन के रूप में प्रचारित किया गया, आज अपनी ही चमक खोता नजर आ रहा है। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार इस स्टेशन की बनावट और डिजिटल सुविधाएं पहली बार आने वाले यात्रियों को भले ही आकर्षित करती हों, लेकिन यहां नियमित सफर करने वाले यात्रियों के लिए जमीनी हकीकत काफी दर्दनाक है। अत्याधुनिक डिजाइन और डिजिटल ढांचे के दावों के बीच स्टेशन का प्रबंधन मूलभूत सुविधाओं को सुचारू रखने में नाकाम साबित हो रहा है।
स्टेशन पर आवाजाही करने वाले हजारों यात्रियों की सबसे बड़ी शिकायत यहां लगे एस्केलेटर और डिजिटल डिस्प्ले स्क्रीन को लेकर है। यात्रियों का कहना है कि स्टेशन पर अक्सर एस्केलेटर बंद रहते हैं, जिसके कारण उन्हें भारी-भरकम सामान लेकर सीढ़ियों से चढ़ने-उतरने को मजबूर होना पड़ता है। इतना ही नहीं, ट्रेनों की आवाजाही और कोच पोजीशन बताने वाली डिजिटल स्क्रीन भी कई बार ठप रहती हैं। इस तकनीकी खराबी की वजह से यात्रियों को सही जानकारी नहीं मिल पाती और वे प्लेटफार्मों के बीच भटकने को मजबूर होते हैं।
इन अव्यवस्थाओं का सबसे गंभीर असर अकेली यात्रा करने वाली महिलाओं, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों पर पड़ रहा है। अक्सर देखा जाता है कि महिलाएं छोटे बच्चों को गोद में लिए, एक हाथ में भारी सामान और दूसरे हाथ से बच्चे को संभालते हुए सीढ़ियां चढ़ती हैं। बुजुर्गों के लिए बंद एस्केलेटर किसी बड़ी बाधा से कम नहीं है। यात्रियों का आरोप है कि बार-बार शिकायत करने के बावजूद प्रबंधन द्वारा इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है और न ही इन समस्याओं का कोई स्थायी समाधान निकाला जा रहा है।
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स्टेशन की भव्यता को लेकर यात्रियों का कहना है कि केवल ऊंची इमारतें और आधुनिक डिजाइन किसी स्टेशन की पहचान नहीं हो सकती। असली पहचान यात्रियों को मिलने वाली सुचारू सुविधाओं से बनती है। जिस स्टेशन को देश के लिए एक 'मॉडल' के रूप में पेश किया गया था, वहां मूलभूत सुविधाओं का बार-बार ठप होना प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यात्रियों ने मांग की है कि स्टेशन प्रबंधन नियमित मॉनिटरिंग की व्यवस्था करे ताकि एस्केलेटर, लिफ्ट और डिजिटल स्क्रीन जैसी जरूरी सुविधाएं 24 घंटे चालू रहें और आम जनता को परेशानी न हो।