
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। दूषित पानी से इंदौर में 17 लोगों की मौत के बाद भी शहर सरकार का रवैया औपचारिक है। नगर निगम की प्रयोगशाला में आंकड़ों की बाजीगरी कर लोगों को भ्रम का अमृत पिलाया जा रहा है। हकीकत में नगर निगम की जांच सरकार के ही पेयजल मानकों को पूरा नहीं कर रही है। पर्यावरणविदों ने इस तरह की जांच को धोखा बताया है।
सामने आया है कि नगर निगम का मैदानी अमला पानी में केवल गंध, रंग, स्वाद, पीएच, टरबिडिटी और क्लोरीन की जांच कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ये सतही जांचें महज तीन घंटे के भीतर पूरी कर ली जाती हैं। जबकि पानी में मौजूद घातक रसायनों, बैक्टीरिया और भारी धातुओं का पता लगाने वाली विस्तृत जांच में तीन से पांच दिन का समय लगता है।
पर्यावरणविद डॉ. सुभाष पांडेय का कहना है कि नगर निगम की रिपोर्ट काफी संदिग्ध और गोलमाल है। रिपोर्ट में अधिकांश मानकों की रीडिंग को 00 (शून्य) दिखाया गया है, जो वैज्ञानिक रूप से संभव नहीं है। विशेष रूप से टोटल कोलीफार्म को हर जगह शून्य बताया गया है। पानी पाइपलाइन में कुछ दूरी तय करता है, तो उसमें कुछ न कुछ तत्व या बैक्टीरिया जरूर आते हैं, भले ही क्लोरीन डाला गया हो । इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट नहीं है कि पानी का नमूना बोरिंग का है या नर्मदा का। स्रोत की जानकारी के बिना ऐसी रिपोर्ट का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं रह जाता।
अंदाज पीने के पानी में आयरन (0.3 एमजी/एल), फ्लोराइड (1.0 एमजी/एल), नाइट्रेट (45 एमजी/एल), जिंक (5 एमजी/एल) और लेड (0.01 एमजी/एल) जैसे घातक तत्वों की जांच होना अनिवार्य है, लेकिन निगम की रिपोर्ट में इनका कोई जिक्र नहीं है।
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मापदंड - स्वीकार्य सीमा
(भारतीय मानक ब्यूरो (बीआइएस) के दिशानिर्देशों के अनुसार शुद्ध पेयजल के लिए इन मापदंडों का पालन जरूरी है)
हम पानी के स्टैंडर्ड पोर्टेबिलिटी टेस्ट करवा रहे हैं। हेवी मेटल के टेस्ट नहीं करवा रहे। स्टैंडर्ड पोर्टेबिलिटी टेस्ट में सभी जरूरी जांच हो जाती है। अभी इसी की जरूरत महसूस हो रही है।- संस्कृति जैन, आयुक्त, नगर निगम भोपाल