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जनता को पिलाया जा रहा 'भ्रम' का अमृत, आंकड़ों की बाजीगरी में जुटी निगम की लैब, पानी की जांच रिपोर्ट पर खड़े हुए बड़े सवाल

Indore Water Scam: दूषित पानी से इंदौर में 17 लोगों की मौत के बाद भी शहर सरकार का रवैया औपचारिक है। नगर निगम की प्रयोगशाला में आंकड़ों की बाजीगरी कर ल...और पढ़ें

By PANKAJ SHRIVASTAVAEdited By: Dheeraj Belwal
Publish Date: Mon, 05 Jan 2026 10:03:18 PM (IST)Updated Date: Mon, 05 Jan 2026 10:03:18 PM (IST)
जनता को पिलाया जा रहा 'भ्रम' का अमृत, आंकड़ों की बाजीगरी में जुटी निगम की लैब, पानी की जांच रिपोर्ट पर खड़े हुए बड़े सवाल
जनता को पिलाया जा रहा 'भ्रम' का अमृत। AI Generated image

HighLights

  1. राजधानी में हो रही BIS मानकों की सरेआम अनदेखी
  2. इंदौर में पानी की सतही जांच कर पल्ला झाड़ रहा निगम
  3. रिपोर्ट में स्रोत (नर्मदा या बोरिंग) की जानकारी भी नहीं

नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल। दूषित पानी से इंदौर में 17 लोगों की मौत के बाद भी शहर सरकार का रवैया औपचारिक है। नगर निगम की प्रयोगशाला में आंकड़ों की बाजीगरी कर लोगों को भ्रम का अमृत पिलाया जा रहा है। हकीकत में नगर निगम की जांच सरकार के ही पेयजल मानकों को पूरा नहीं कर रही है। पर्यावरणविदों ने इस तरह की जांच को धोखा बताया है।

सामने आया है कि नगर निगम का मैदानी अमला पानी में केवल गंध, रंग, स्वाद, पीएच, टरबिडिटी और क्लोरीन की जांच कर रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ये सतही जांचें महज तीन घंटे के भीतर पूरी कर ली जाती हैं। जबकि पानी में मौजूद घातक रसायनों, बैक्टीरिया और भारी धातुओं का पता लगाने वाली विस्तृत जांच में तीन से पांच दिन का समय लगता है।


रिपोर्ट काफी संदिग्ध और गोलमाल

पर्यावरणविद डॉ. सुभाष पांडेय का कहना है कि नगर निगम की रिपोर्ट काफी संदिग्ध और गोलमाल है। रिपोर्ट में अधिकांश मानकों की रीडिंग को 00 (शून्य) दिखाया गया है, जो वैज्ञानिक रूप से संभव नहीं है। विशेष रूप से टोटल कोलीफार्म को हर जगह शून्य बताया गया है। पानी पाइपलाइन में कुछ दूरी तय करता है, तो उसमें कुछ न कुछ तत्व या बैक्टीरिया जरूर आते हैं, भले ही क्लोरीन डाला गया हो । इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट नहीं है कि पानी का नमूना बोरिंग का है या नर्मदा का। स्रोत की जानकारी के बिना ऐसी रिपोर्ट का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं रह जाता।

इन महत्वपूर्ण मानकों की हुई अनदेखी

  • डिजाल्व्ड ऑक्सीजन (डीओ): पानी में आक्सीजन का मान कम से कम 6 एमजी/एल होना चाहिए, जिसे निगम ने चेक ही नहीं किया।
  • बीओडी और सीओडी : पानी में रासायनिक प्रदूषण मापने के लिए बीओडी (2 एमजी/एल से कम) और सीओडी (5 एमजी/एल से कम) की जांच अनिवार्य है, जो रिपोर्ट से गायब है।
  • आधुनिक खतरे : रिपोर्ट में माइक्रोप्लास्टिक और कीटनाशकों (पैसटीसाइड) की उपस्थिति की कोई जांच नहीं की गई है।

घातक तत्वों को किया नजर

अंदाज पीने के पानी में आयरन (0.3 एमजी/एल), फ्लोराइड (1.0 एमजी/एल), नाइट्रेट (45 एमजी/एल), जिंक (5 एमजी/एल) और लेड (0.01 एमजी/एल) जैसे घातक तत्वों की जांच होना अनिवार्य है, लेकिन निगम की रिपोर्ट में इनका कोई जिक्र नहीं है।

क्या जांचा (निगम का दावा) - क्या छुपाया (हकीकत)

  • स्वाद और रंग : सब ठीक है - लेड और आर्सेनिक: जांच ही नहीं की
  • क्लोरीन : पर्याप्त है - बीओडी/सीओडी : रिपोर्ट से नदारद
  • बैक्टीरिया : शून्य - स्रोतः जानकारी गायब

यह भी पढ़ें- इंदौर जल त्रासदी: भागीरथपुरा में तैनात हुआ संजीवनी क्लिनिकों का स्टाफ, मरीजों को लौटना पड़ रहा बैरंग

बीआइएस 2012 के अनुसार अनिवार्य मानक

मापदंड - स्वीकार्य सीमा

  • पीएच - 6.5 – 8.5
  • टोटल डिजाल्व्ड सालिड्स (टीडीएस) - 500 एमजी /एल (अधिकतम 2000)
  • आर्सेनिक - 0.01 एमजी /एल
  • लेड (सीसा) - 0.01 एमजी/एल
  • फ्लोराइड - 1.0 एमजी/एल
  • क्लोरीन - 0.2 एमजी/एल
  • नाइट्रेट - 45 एमजी/एल
  • कोलीफार्म बैक्टीरिया - 0 (प्रति 100 एमएल सैंपल)

(भारतीय मानक ब्यूरो (बीआइएस) के दिशानिर्देशों के अनुसार शुद्ध पेयजल के लिए इन मापदंडों का पालन जरूरी है)

हम पानी के स्टैंडर्ड पोर्टेबिलिटी टेस्ट करवा रहे हैं। हेवी मेटल के टेस्ट नहीं करवा रहे। स्टैंडर्ड पोर्टेबिलिटी टेस्ट में सभी जरूरी जांच हो जाती है। अभी इसी की जरूरत महसूस हो रही है।- संस्कृति जैन, आयुक्त, नगर निगम भोपाल