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वीर बोल : बीस हजार करोड़ की प्यास और बेकाबू होता शराब का 'जहर तंत्र'

MP Liquor Mafia: जब रक्षक ही सड़क पर रौंदे जा रहे हों और जनता जहर पीकर मर रही हो, तो यह पूछना ही पड़ेगा कि सरकार की ऐसी कौन सी मजबूरी है जो इस बेलगाम माफिया के आगे घुटने टेकने को विवश करती है?

By Virendra tiwariEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Tue, 03 Nov 2026 11:04:12 AM (IST)Updated Date: Tue, 03 Nov 2026 11:17:07 AM (IST)
वीर बोल : बीस हजार करोड़ की प्यास और बेकाबू होता शराब का 'जहर तंत्र'
देवास जिले में खातेगांव टीआई दिलीप पुरी गोस्वामी की शराब माफिया ने ट्रक से कुचलकर हत्या कर दी थी।

HighLights

  1. आखिर सरकार का खजाना भरने के लिए कितनी जिंदगियों की कीमत चुकाई जाएगी?
  2. शराब से होने वाली कमाई का हिसाब बजट में है, लेकिन उससे बर्बाद होने वाले परिवारों और जान गंवाने वालों का हिसाब कौन देगा?
  3. हर शराब कांड के बाद एसआइटी बनी-सिफारिशें आज तक लागू क्यों नहीं हुईं?

वीरेन्द्र तिवारी, नवदुनिया भोपाल। देश में एक बार फिर मातम पसरा है और हर बार की तरह व्यवस्था की संवेदना चंद तबादलों व मुआवजे की घोषणाओं तक सिमट कर रह गई है। सागर के बंडा में तीस से ज्यादा घरों के चिराग बुझ गए, देवास में तेरह जिंदगियां जहरीली शराब की भेंट चढ़ गईं, और अब तो हद ही हो गई।

अवैध शराब का ट्रक रोकने की जुर्रत करने पर एक जांबाज थाना प्रभारी को दिनदहाड़े कुचलकर मार डाला गया। जब रक्षक ही सड़क पर रौंदे जा रहे हों और जनता जहर पीकर मर रही हो, तो यह पूछना ही पड़ेगा कि सरकार की ऐसी कौन सी मजबूरी है जो इस बेलगाम माफिया के आगे घुटने टेकने को विवश करती है?


जवाब बहुत सीधा, मगर कड़वा है—17,681 करोड़ रुपये का आबकारी राजस्व! वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि सरकार की तिजोरी में शराब से आने वाली यह रकम अब तक के सर्वोच्च स्तर पर है, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा (करीब 14 करोड़ प्रूफ लीटर) देसी शराब का है। लोकलुभावन योजनाओं के भारी-भरकम खर्च को चलाने के लिए सरकार को यह 'लिकर रेवेन्यू' सबसे आसान रास्ता लगता है।

लेकिन क्या सवा सात करोड़ की आबादी वाले प्रदेश के पास इस राजस्व की भरपाई का कोई नैतिक विकल्प नहीं है? यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो रेत और खनिज के अवैध उत्खनन की लीकेज रोककर ही सालाना 7 से 8 हजार करोड़ रुपये जुटाए जा सकते हैं। महाकाल लोक की तर्ज पर ओरछा, चित्रकूट और टाइगर टूरिज्म को निखारकर व जीएसटी की कर-चोरी पर डिजिटल नकेल कसकर इस पूरे घाटे को आसानी से पाटा जा सकता है। जब बिहार जैसा सीमित संसाधनों वाला राज्य राजनीतिक साहस दिखाकर शराबबंदी का कदम उठा सकता है, तो मध्यप्रदेश क्यों झिझक रहा है?

दरअसल, बीमारी सिर्फ राजस्व के मोह की नहीं, बल्कि सिस्टम की रगों में उतर चुके भ्रष्टाचार की है। 2020 के उज्जैन कांड (16 मौतें) और 2021 के मुरैना कांड (24 मौतें),मंदसौर 21 मौत के बाद सीनियर आईएएस डा. राजेश राजौरा के नेतृत्व में 3 एसआईटी बनीं जिसने कई सिफारिशें दी थीं। इंडस्ट्रियल स्पिरिट की जीपीएस ट्रैकिंग, अभेद्य होलोग्राम, खरीददार के लिए अनिवार्य बिल और शराब के दाम पड़ोसी राज्यों के समानांतर रखना।

यह सभी सिफारिशें आज भी फाइलों में धूल फांक रही हैं। 2021 में जहरीली शराब से मौत पर "फांसी" का कानून तो बना दिया गया, लेकिन लचर विवेचना के चलते आज तक एक भी सिंडिकेट सरगना फंदे तक नहीं पहुंचा। विडंबना देखिए कि मध्य प्रदेश सरकार का आबकारी राजस्व लक्ष्य 2025-26 के 17,500 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2026-27 में 20,279 करोड़ रुपये कर दिया गया।

शराब दुकानों के आरक्षित मूल्य में भी 20 प्रतिशत वृद्धि की गई। सवाल यह है कि जब शराब की ऊंची कीमतों से अवैध कारोबार को प्रोत्साहन मिलने की आशंका है तो सरकार की बढ़ती राजस्व अपेक्षाएं इस समस्या को कैसे हल करेंगी? क्या सरकार शराब की बिक्री कम करना चाहती है या उससे होने वाली कमाई बढ़ाना चाहती है? एक तरफ महंगी वैध शराब और दूसरी तरफ सस्ती अवैध शराब का बाजार फल-फूल रहा हो तो इस अंतर का लाभ शराब माफिया ही उठाएगा।

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हकीकत यही है कि असली जहर उस बोतल के मेथेनाल में नहीं, बल्कि आबकारी और पुलिस तंत्र की उस "मंथली व्यवस्था" में घुला है, जो बिना राजनीतिक संरक्षण के नहीं चल सकती। समय आ गया है कि प्रदेश अब चरणबद्ध शराबबंदी, बड़े पैमाने पर जनजागरण या कम से कम आबकारी-पुलिस की संयुक्त टीम बनाकर माफिया के संपूर्ण सफाए की ओर निर्णायक कदम बढ़ाए।

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किसी भी कल्याणकारी राज्य के लिए सत्रह हजार करोड़ का राजस्व, उसके नागरिकों की सांसों और वर्दी के इकबाल से बड़ा नहीं हो सकता। हमें तय करना होगा कि आखिर सरकार का खजाना भरने के लिए कितनी जिंदगियों की कीमत चुकाई जाएगी? क्योंकि शराब से होने वाली कमाई का हिसाब बजट में है, लेकिन उससे बर्बाद होने वाले परिवारों और जान गंवाने वालों का हिसाब कौन देगा?

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