
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। चांदी की कीमतों में आए ऐतिहासिक उछाल ने जहां एक ओर निवेशकों को खुश किया है, वहीं दूसरी ओर आम खरीदारों की चिंता बढ़ा दी है। ग्वालियर के सर्राफा बाजार में गुरुवार को चांदी के दाम दो लाख 45 हजार रुपये प्रति किलो के स्तर पर पहुंचने के बाद, अब बाजार में चांदी जैसी ही चमक वाली धातु जर्मन सिल्वर के जेवरों की आमद बढ़ गई है। शादियों के सीजन में चांदी की बढ़ती मांग का फायदा उठाकर कुछ मुनाफाखोर असली चांदी की जगह मिलावटी या नकली धातु खपाने की कोशिश कर रहे हैं।
सराफा कारोबारी गौरव के अनुसार, जर्मन सिल्वर में सिल्वर (चांदी) नाम की कोई चीज नहीं होती। यह तांबा, जस्ता और निकल का एक मिश्रण होता है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पॉलिश होने के बाद यह दिखने में बिल्कुल असली चांदी जैसा ही चमकता है। कम वजन और सुंदर नक्काशी के कारण आम ग्राहक पहली नजर में असली और नकली का अंतर नहीं कर पाते। अक्सर फुटपाथों या अस्थायी दुकानों पर बिकने वाले भारी पायल और बिछिया इसी धातु के बने होते हैं।
हॉलमार्किंग की जांच- सोने की तरह अब चांदी के जेवरों पर भी हॉलमार्किंग अनिवार्य है। बिना हॉलमार्क वाले गहने खरीदने से बचें।
चुंबक टेस्ट- असली चांदी चुंबकीय नहीं होती। यदि गहना चुंबक की ओर आकर्षित हो रहा है, तो समझ लें कि उसमें लोहा या निकल जैसी धातुएं मिली हुई हैं।
बनावट और ध्वनि- असली चांदी को किसी ठोस चीज पर गिराने पर एक मधुर और लंबी खनक आती है, जबकि जर्मन सिल्वर की आवाज भारी और कम गूंज वाली होती है।
विश्वसनीय दुकान से ही खरीदें- शहर के प्रतिष्ठित शोरूम या पुश्तैनी दुकानों से ही खरीदारी करें और पक्का बिल जरूर मांगें। बिल पर चांदी की शुद्धता का जिक्र होना चाहिए।
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महंगाई के कारण शहर के मध्यमवर्गीय परिवारों में अब चांदी के भारी बर्तनों के बजाय कम कैरेट या हल्के आभूषणों का चलन बढ़ा है। लेकिन इसी बीच सस्ते के चक्कर में लोग जर्मन सिल्वर के झांसे में आ रहे हैं। जानकारों का कहना है कि जर्मन सिल्वर के जेवर कुछ समय बाद काले पड़ जाते हैं और उनकी कोई रीसेल वैल्यू नहीं होती, जबकि असली चांदी हमेशा एक मूल्यवान निवेश रहती है।