
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मुरार नदी की सफाई और पुनर्जीवन से जुड़े मामले में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब तक नदी क्षेत्र से अतिक्रमण नहीं हटाए जाते, तब तक सफाई के नाम पर पैसा खर्च करना सिर्फ धन की बर्बादी होगा।
न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने बुधवार को मुरार नदी से जुड़े एक मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से मुरार नदी की सफाई से संबंधित डीपीआर का हवाला दिया गया।
इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अतिक्रमण हटाए बिना नदी की सफाई पर डीपीआर के तहत खर्च करना उचित नहीं होगा।
नगर निगम ने मांगा समय
नगर निगम के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि नदी क्षेत्र में अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी गई है। इस पर निगम की ओर से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए एक सप्ताह का समय मांगा गया, जिसे कोर्ट ने मंजूर कर लिया।
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कोर्ट ने नगर निगम को निर्देश दिया कि वह अगली सुनवाई में यह बताए कि अतिक्रमण हटाने के लिए अब तक क्या प्रभावी कदम उठाए गए हैं। इसके लिए निगम को प्रत्येक प्रकरण की आदेश-पत्रिकाएं भी रिकार्ड पर रखने के निर्देश दिए गए हैं।
28 सितंबर को होगी अगली सुनवाई
कोर्ट यह भी जांचना चाहता है कि अतिक्रमण हटाने के लिए जारी किए गए कारण बताओ नोटिसों पर नगर निगम ने वास्तव में आगे की कार्रवाई की है या फिर नोटिस जारी करने के बाद उन्हें लंबित ही छोड़ दिया गया है। अदालत ने निगम से कार्रवाई की पूरी स्थिति दस्तावेजों के साथ प्रस्तुत करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को होगी।