माफिया से अपनी बेशकीमती जमीन नहीं बचा पाई पुलिस, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने याचिका की खारिज
Gwalior News: पुलिस की कीमती जमीन का मामला कोर्ट में चलने के बाद भी माफिया की ओर से मौके पर प्लॉटिंग की जा रही थी, जिसे नईदुनिया ने प्रमुखता से उठाया ...और पढ़ें
Publish Date: Thu, 15 Jan 2026 11:08:19 AM (IST)Updated Date: Thu, 15 Jan 2026 11:08:19 AM (IST)
माफिया से अपनी बेशकीमती जमीन नहीं बचा पाई पुलिसHighLights
- हाई कोर्ट ने देरी माफी का आवेदन खारिज कर दिया
- नईदुनिया ने प्रमुखता से उठाया तो पुलिस के कान खड़े हुए
- पुलिस अपनी ही जमीन की निगरानी नहीं कर पा रही थी
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने पुलिस की जडेरूआ खुर्द गोला के मंदिर क्षेत्र में बेशकीमती 14 बीघा जमीन के मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने राज्य शासन की 14 बीघा जमीन के मामले में री-स्टोर याचिका पर सख्त रुख अपनाते हुए 222 दिन की देरी माफ करने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने साफ कहा कि जब विभाग अपने कामकाज और अधिकारियों की कार्यप्रणाली सुधारने को गंभीर नहीं है, तो देरी माफी का कोई आधार नहीं बनती। पुलिस विभाग अपने अधिकारियों को वास्तविक दंड देने की बजाए औपचारिक व अस्थाई सजा देने की प्रवृत्ति अपनाए हुए है।
निंदा दंड की अवधि केवल एक वर्ष होती है
यह मामला एमसीसी क्रमांक 3848/2025 (राज्य शासन बनाम रामसेवक, मृतक, एलआर के माध्यम से) से जुड़ा है। इसमें राज्य शासन ने वर्ष 2007 की रिट याचिका को बहाल करने के लिए आवेदन किया था। राज्य की ओर से बताया गया कि 12 जनवरी 2026 को पुलिस महानिदेशक द्वारा संबंधित अधिकारी पर ‘निंदा’ का दंड दिया गया है। यह भी माना गया कि जबलपुर पीठ के निर्णय के अनुसार निंदा दंड की अवधि केवल एक वर्ष होती है।
देरी माफी का आवेदन खारिज कर दिया
न्यायालय ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि जानबूझकर हल्का दंड दिया गया, ताकि एक साल बाद अधिकारी को सभी लाभ मिल सकें और कोई वास्तविक सजा प्रभावी न हो। यह भी कहा कि विभाग न तो अपने तौर-तरीकों में सुधार कर रहा है और न ही अधिकारियों को न्यायालयीन कार्यवाहियों के प्रति सतर्क बना रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने देरी माफी का आवेदन खारिज कर दिया। इसके साथ ही रिट याचिका की बहाली के लिए दायर एमसीसी को भी खारिज कर दिया।
क्या है ये मामला?
जड़ेरुआ खुर्द में पुलिस विभाग की 15 सर्वे नंबर की 14 बीघा जमीन है, जो पुराने खसरों में पुलिस विभाग दर्ज है। इस पर रामसेवक ने दावा पेश किया। रामसेवक ने जमीन पर एक पक्षीय डिक्री हासिल कर ली। जब शासन को एक पक्षीय डिक्री की जानकारी मिली तो न्यायालय में आवेदन लगाया, लेकिन जिला कोर्ट से राहत नहीं मिल सकी।
इसके बाद शासन ने 2007 में हाई कोर्ट में याचिका दायर की। कहा कि प्रदेश में सरकार बदलने के बाद शासकीय अधिवक्ताओं का बदलाव हुआ। यह बेशकीमती जमीन है। 2007 से याचिका लंबित थी। 2008 में रामसेवक का निधन हो गया, लेकिन पुलिस ने उसके परिजनों को याचिका में पार्टी नहीं बनाया।
नईदुनिया ने उठाया था मुद्दा
पुलिस की कीमती जमीन का मामला कोर्ट में चलने के बाद भी माफिया की ओर से मौके पर प्लॉटिंग की जा रही थी, जिसे नईदुनिया ने प्रमुखता से उठाया तो पुलिस के कान खड़े हुए।
एएसपी अनु बेनीवाल, सीएसपी मुरार अतुल सोनी सहित अफसर मौके पर पहुंचे और दो बोर्ड लगवाए, जिसमें कोर्ट के मामले का उल्लेख कराया। इस खुलासे के बाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया था। पुलिस अपनी ही जमीन की निगरानी नहीं कर पा रही थी।