
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। टमटम पलटने से घायल नासिर अली को उसके स्वजन अंचल के सबसे बड़े अस्पताल जया आरोग्य के आघात उपचार केंद्र लेकर पहुंचे। उम्मीद थी कि समय पर इलाज मिलेगा, लेकिन हकीकत इसके उलट निकली। दोपहर दो बजे तक न तो समुचित उपचार शुरू हुआ और न ही घायल की स्थिति को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी दी गई।
आघात उपचार केंद्र में मौजूद कनिष्ठ चिकित्सकों ने नासिर के स्वजनों को यह कहकर हताश कर दिया कि उसे कम से कम एक माह तक अस्पताल में पड़े रहना पड़ेगा और बेहतर होगा कि निजी अस्पताल में इलाज करा लिया जाए। जबकि नासिर के पैर की हड्डी टूटी हुई थी और तत्काल उपचार की आवश्यकता थी।
आघात उपचार केंद्र में इलाज नहीं मिलने के कारण नासिर जैसे कई मरीज मजबूरी में निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं। जांच व्यवस्था की बदहाली भी मरीजों की परेशानी बढ़ा रही है। उपचार के लिए उपलब्ध संसाधनों की स्थिति भी चिंताजनक है। आघात उपचार केंद्र की एक्स-रे मशीन का सीआर तंत्र वर्षों से खराब है, इसके बावजूद उसी के सहारे काम चलाया जा रहा है। कई बार मशीन बंद हो जाती है, जिससे जांच पूरी तरह प्रभावित होती है।
जब एक्स-रे की सुविधा ठप हो जाती है, तब मरीजों को दो किलोमीटर दूर स्थित हजार बिस्तर अस्पताल भेजा जाता है। घायल और गंभीर मरीजों के लिए यह दूरी और प्रतीक्षा दोनों ही जोखिम भरी साबित होती हैं।
हजार बिस्तर अस्पताल- जहां नर्स और चिकित्सक ढूंढने पर भी नहीं मिलते
रविवार दोपहर 12:30 बजे जब नईदुनिया की टीम हजार बिस्तर अस्पताल की चौथी मंजिल पर स्थित शल्य चिकित्सा वार्ड (इकाई-2) पहुंची, तो स्थिति चौंकाने वाली थी। वार्ड में न तो कनिष्ठ चिकित्सक मौजूद थे और न ही नर्स। गोहद निवासी मरीज लोकेन्द्र का छुट्टी प्रमाण पत्र 17 जनवरी को ही बन गया था, लेकिन चिकित्सक के न होने के कारण उसे अगले दिन भी घंटों वार्ड में रुकना पड़ा। स्वजन हाथ में कागजात लिए जिम्मेदार व्यक्ति के आने का इंतजार करते रहे।
मुन्नी की जद्दोजहद
रविवार को शिवपुरी से संदर्भित होकर आई मुन्नी आदिवासी के स्वजनों को औषधि विभाग में भर्ती कराने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। संदर्भित मरीजों के लिए यहां की प्रक्रिया किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। अस्पताल की ये अव्यवस्थाएं मरीजों और उनके स्वजनों का भरोसा तोड़ रही हैं, जिससे वे मजबूरी में निजी अस्पतालों की ओर जा रहे हैं।
भर्ती कराने में लगे तीन घंटे
मरीज कुसुमा देवी को जब स्वजन झांसी से सुबह हजार बिस्तर अस्पताल लेकर पहुंचे, तो उन्हें आकस्मिक विभाग भेज दिया गया। सीधे औषधि विभाग में भर्ती नहीं किया गया। इस दौरान लिफ्ट बंद होने से भी परेशानी हुई। कुसुमा देवी को भर्ती कराने में स्वजनों को करीब तीन घंटे तक संघर्ष करना पड़ा।
वार्ड सहायक गायब, बुजुर्ग स्वजन खींच रहे स्ट्रेचर
कुसुमा देवी को झांसी से उपचार के लिए लाया गया, लेकिन अस्पताल के प्रवेश द्वार से ही संघर्ष शुरू हो गया। वार्ड सहायक नहीं मिलने पर बुजुर्ग रामजानकी और उनके बेटे को स्वयं स्ट्रेचर खींचकर ले जाना पड़ा। स्ट्रेचर खींचते हुए रामजानकी थक चुकी थीं, लेकिन मरीज को भर्ती कराने की चिंता में अपनी थकान छुपाए रहीं।
यह बोले स्वजन
रामजानकी, स्वजन
मरीज को लेकर सुबह अस्पताल आ गए थे, लेकिन दोपहर में जाकर भर्ती हो सकी। इस दौरान चिकित्सक इधर-उधर भटकाते रहे। स्ट्रेचर खींचने तक के लिए कोई वार्ड सहायक नहीं मिला। सुबह लिफ्ट भी बंद थीं।
शाहिद, स्वजन
हम नासिर को आघात उपचार केंद्र लेकर आए थे, लेकिन इलाज देने के बजाय यह कहकर डरा दिया गया कि यहां भर्ती हुए तो एक महीने तक पड़े रहोगे। मजबूरी में मरीज को निजी अस्पताल लेकर जा रहे हैं।
सुधीर सक्सेना अधीक्षक जेएएच अस्पताल से सवाल-जवाब
सवाल: अस्पताल में मरीजों को समय पर इलाज क्यों नहीं मिल पा रहा है?
जवाब: अस्पताल पहुंचने वाले प्रत्येक मरीज को उपचार दिया जाता है। यदि किसी विभाग में समस्या है तो व्यवस्थाएं दुरुस्त कराई जाएंगी।
सवाल: बाह्य रोगी विभाग और वार्ड में चिकित्सक समय पर क्यों नहीं रहते?
जवाब: चिकित्सकों को समय पर उपस्थित रहने के निर्देश दिए गए हैं। लापरवाही पाए जाने पर कार्रवाई की जाएगी।
सवाल: एक्स-रे मशीन और अन्य उपकरणों की खराब स्थिति को लेकर शिकायतें हैं?
जवाब: कुछ उपकरण पुराने हैं और बार-बार खराब हो जाते हैं। नए उपकरण मंगवाने की प्रक्रिया चल रही है।
सवाल: आघात उपचार केंद्र से मरीज निजी अस्पताल क्यों जा रहे हैं?
जवाब: आघात उपचार केंद्र में सभी गंभीर मामलों को तुरंत देखा जाता है। कई बार मरीज अपनी सुविधा के अनुसार निजी अस्पताल जाते हैं।
सवाल: अव्यवस्थाएं सुधारने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
जवाब: उपकरणों को दुरुस्त करने और निगरानी व्यवस्था मजबूत करने पर काम किया जा रहा है। मरीजों की शिकायतों को गंभीरता से लिया जा रहा है।
ये हैं सबसे बड़े जिम्मेदार
अस्पताल में मरीजों को हो रही परेशानियों और व्यवस्थाओं को बेहतर कराने की जिम्मेदारी गजराराजा चिकित्सा महाविद्यालय के अधिष्ठाता डा. आरकेएस धाकड़ की है। इसके बावजूद हजार बिस्तर अस्पताल से लेकर आघात उपचार केंद्र तक अव्यवस्थाएं बनी हुई हैं।
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