
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। ईमानदारी से एडवांस संपत्तिकर भरकर छह प्रतिशत की छूट अगस्त माह तक लेने का मौका जनता से सरकारी सिस्टम ने छीन लिया। लोगों को एडवांस टैक्स में छह प्रतिशत की छूट का लाभ जून 2025 के बजाय अगस्त 2025 तक मिल सकता था। नीतिगत मामला होने के कारण परिषद को निर्णय करना था, लेकिन यह प्रस्ताव फाइलों में ही दबकर रह गया और दिसंबर माह में परिषद के पास पहुंच पाया।
विपक्ष ने खड़े किए सवाल
गुरुवार को परिषद की बैठक में जब एजेंडा में यह बिंदु आया, तो विपक्षी पार्षदों ने सवाल खड़े किए कि जनता से जुड़े इस मुद्दे को सदन तक आने में इतना समय कैसे लग गया। सभापति मनोज सिंह तोमर ने जब इस मामले में निगमायुक्त संघ प्रिय से पूछा, तो उन्होंने बताया कि जुलाई माह में एमआइसी ने संकल्प किया था और मैंने तभी इसे एजेंडा में शामिल कर अनुमोदन के लिए महापौर के पास भेजा था। जब अनुमोदन मिला, तब इसे परिषद को भेजा गया।
प्रस्ताव को लौटाना पड़ा
इसके बाद सभापति ने बैठक को 10 मिनट के लिए स्थगित कर पक्ष-विपक्ष के पार्षदों सहित अधिकारियों से मंत्रणा की कि जनता को कैसे इस छूट का लाभ मिल सकता है, लेकिन व्यवहारिक समस्याएं होने के कारण इस प्रस्ताव को लौटाना पड़ा। इसके साथ ही निगमायुक्त को निर्देश दिए गए कि आगे से समय से संकल्प भेजे जाएं। बता दें कि परिषद में चर्चा करने के लिए बिंदुओं को शामिल करने के बाद एजेंडा निगमायुक्त द्वारा तैयार कर महापौर को भेजा जाता है। महापौर द्वारा इसका अनुमोदन करने के बाद इसे परिषद में निर्णय के लिए भेजा जाता है। संपत्तिकर का यह बिंदु पांच माह लटका रहा। इसी से जिम्मेदारों का जनता के प्रति रवैया समझा जा सकता है, जबकि एक्ट में यह भी प्रविधान है कि यदि अनुमोदन मिलने में 10 दिन से अधिक का समय लगता है, तो निगमायुक्त इस बिंदु को सीधे परिषद की ओर अग्रेषित कर सकते थे।
बैठक में गोशाला के गोवंशों के खाद्य पदार्थ क्रय के लिए समयावृद्धि एवं वित्तीय स्वीकृति के बिंदु पर पार्षद ब्रजेश श्रीवास ने आरोप लगाए कि जानबूझकर टेंडर में ऐसी शर्तें रखी गई हैं कि एक ही ठेकेदार को काम मिले। गोशाला में गोवंश बदहाल स्थिति में हैं। पार्षदों ने यह भी मांग की कि इसकी जांच के लिए समिति बनाई जाए। वहीं पार्षद प्रीति परमार ने कहा कि ठहराव तो यह भी हुआ था कि सभी पार्षद महीने में एक बार गोशाला में जाकर सेवा करेंगे, लेकिन उसका किसी पार्षद ने ख्याल नहीं रखा। इस मुद्दे पर चर्चा पूरी नहीं हो सकी, तो सभापति ने बैठक को 12 जनवरी दोपहर तीन बजे तक के लिए स्थगित कर दिया।
नामकरण पर हुई बहस, एक जैसे प्रस्तावों की निगमायुक्त करेंगे जांच
नगर निगम के क्षेत्रीय कार्यालय क्रमांक तीन लूटपुरा का नाम परिवर्तित कर इंदिरा नगर करने सहित विभिन्न नामकरण के बिंदु भी एजेंडा में शामिल थे, जिस पर चर्चा शुरू हुई। विपक्षी पार्षद देवेंद्र राठौर ने कहा कि इंदिरा नगर के बजाय इसका नाम पूर्व नेता प्रतिपक्ष स्व. देवेंद्र सिंह तोमर के नाम पर किया जाए। नामकरण को लेकर पहले से ही महापौर ने कमेटी बनाई है और महापुरुषों के नाम पर कई मार्गों व इमारतों के नामकरण पूर्व में हो चुके हैं। इससे विवाद की स्थिति बनेगी, क्योंकि एमआइसी ने जुलाई 2025 में कई ऐसी सड़कों के नामकरण कर दिए थे जिनको लेकर परिषद से ठहराव पास हुए थे। एजेंडा में यह बिंदु जुड़ कैसे गए। इस पर निगमायुक्त ने कहा कि महापौर की ओर से संकल्प जोड़े गए थे।
सभापति ने फिर पूछा कि क्या संकल्पों से आयुक्त सहमत हैं, क्योंकि निगम के ही अधिकारी परिषद द्वारा किए गए नामकरण की पट्टिका व बोर्ड लगाने के लिए टेंडर कर चुके हैं। इस पर निगमायुक्त ने जवाब दिया कि अंतिम निर्णय परिषद को लेना है। सत्ता पक्ष की ओर से अवधेश कौरव ने मांग की कि जिन सड़कों का महापुरुषों के नाम पर नामकरण हो चुका है, उन्हें छोड़कर बाकी को स्वीकृत कर दिया जाए। इस पर सभापति ने आसंदी से आदेश किया कि सभी बिंदु एक जैसे ही हैं। निगमायुक्त उक्त प्रस्तावों की जांच कर पुनः भिजवाएं, जिससे चर्चा कर निर्णय लिए जा सकें एवं और भी ऐसे प्रस्ताव हैं तो उनको जांच कर शामिल करें।
शिकायत को लेकर धरने पर बैठे पार्षद
संपत्तिकर के मुद्दे पर चर्चा के दौरान ग्रामीण वार्ड के पार्षद मनोज यादव ने कहा कि ग्रामीण वार्ड फिलहाल नगर निगम में जुड़े हुए हैं, लेकिन वहां वर्ष 2014 से टैक्स मांगा जा रहा है। मैंने एक आदमी को टैक्स जमा करने के लिए भेजा, तो उससे टीसी धर्मेंद्र सोनी का विवाद हुआ। इसके बाद उस पर एफआइआर दर्ज करा दी गई। मेरे खिलाफ भी एसपी ऑफिस में आवेदन दिया। ऐसे में टीसी पर कार्रवाई की जाए।
हालांकि निगमायुक्त ने सभापति को बताया कि टीसी को वार्ड से हटा दिया गया था, लेकिन पार्षद नहीं माने और धरने पर बैठ गए। महापौर ने भी कार्रवाई की बात कही, तो सभापति ने निगमायुक्त को जांच कर आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए।