
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। ग्वालियर जिला कोर्ट के षष्टम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विवेक कुमार ने वरिष्ठ महिला नागरिक से 'डिजिटल अरेस्ट' के नाम पर 38 लाख रुपये की धोखाधड़ी करने के मामले में अंतिम फैसला सुनाया है। न्यायालय ने मामले से जुड़े तीन अभियुक्तों—हरीश चौधरी, अनिल नायक और ओमप्रकाश नायक को भारतीय दंड संहिता की धारा 411 (चोरी की संपत्ति को बेईमानी से प्राप्त करना) और धारा 120-बी के तहत दोषी पाते हुए एक-एक वर्ष के सश्रम कारावास और आर्थिक जुर्माने की सजा सुनाई है।
फर्जी सीबीआई अधिकारी बनने और जालसाजी से जुड़े कड़े आरोपों (धारा 420, 384, 467, 468, 471 और आईटी एक्ट की धारा 66-डी) में पर्याप्त सीधे सबूतों के अभाव के कारण न्यायालय ने उन्हें तकनीकी रूप से संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया, लेकिन धोखाधड़ी से प्राप्त धन का प्रबंधन करने और उसे छुपाने के अपराध में इन्हें सख्त सजा दी गई है। वहीं इस मामले में जांच में लापरवाही पर एसपी ग्वालियर को संबंधित अधिकारी की जांच कर एक्शन टेकन रिपोर्ट पेश करने के लिए निर्देशित किया गया है।
जानकारी के अनुसार यह मामला अप्रैल 2024 का है। फरियादिया डॉ. सुजाता बापट निवासी गुलमोहर सिटी, ग्वालियर, को 9 अप्रैल 2024 को एक अज्ञात नंबर से फोन आया। फोन करने वाले व्यक्ति ने स्वयं को प्रसिद्ध कुरियर कंपनी 'डीएचएल' का कर्मचारी राजीव गुप्ता बताया।
उसने महिला को डराते हुए कहा कि उनके नाम से लखनऊ से म्यांमार के लिए एक पार्सल बुक किया गया है, जिसमें एक लैपटॉप, पासपोर्ट और अवैध एमडीएमए ड्रग्स मिले हैं। जब महिला ने ऐसे किसी भी पार्सल से इनकार किया, तो जालसाजों ने उन्हें कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर टेलीग्राम ऐप डाउनलोड करवाया।
टेलीग्राम पर वीडियो कॉल के माध्यम से खुद को पुलिस और सीबीआई के बड़े अधिकारी बताते हुए कुछ लोगों ने महिला को 'डिजिटल अरेस्ट' (अवैध निगरानी) में ले लिया। अपराधियों ने महिला को डराया कि उनके एचडीएफसी बैंक खाते में 3 करोड़ 5 लाख रुपये का संदिग्ध मनी लॉन्ड्रिंग और मानव तस्करी का ट्रांजैक्शन हुआ है। इसके बाद कई जाली दस्तावेज भेजकर महिला केा डराया और आरटीजीएस के माध्यम से महिला ने एफडी तोड़कर रकम ट्रांसफर कर दी।
न्यायलय ने कहा कि प्रकरण को अनंतकाल तक अग्रिम विवेचना पर लंबित रखने की लेट लतीफी करने की प्रवृत्ति साफ तौर पर दर्शित हो रही है जिसके कारण साक्ष्य के अभाव में सहआरोपीगण की दोषमुक्ति होना स्पष्ट है। उक्त प्रवृत्ति से न्याय की हानि हो रही है। हस्तगत प्रकरण में मुख्य विवेचक की मृत्यु होना बताया गया है किंतु उसके स्थान पर किसी दूसरे विवेचना द्वारा भी आगे की विवेचना होना दर्शित नहीं है।
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निष्पक्ष विवेचना अभियुक्त और स्वस्थ्य समाज के लिये अत्यंत आवश्यक है और विवचेना की लेट लतीफी से यदि किसी पक्ष को फायदा और किसी को नुकसान हो रहा है तो यह न्याय की हानि है। अतः पुलिस अधीक्षक, ग्वालियर को निर्देशित किया जाता है कि इस प्रकरण में विवेचना में इतनी लेट-लतीफी क्यों रही, तत्संबंध में संबंधित से स्पष्टीकरण लेकर विधिपूर्वक कार्यवाही अमल लायें और 15 दिवस के अंदर इस न्यायालय में तत्संबंध में एक्शन टेकन रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
वर्तमान प्रकरण में उक्त बिंदुओं पर की गई कार्यवाही तथा विवेचना की अद्यतन स्थिति स्पष्ट होना आवश्यक है। अतः प्रकरण में एक पृथक् एमजेसी पंजीबद्ध की जाए तथा संबंधित विवेचना अधिकारी को नोटिस जारी किया जाए।
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